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रूपक महोत्सव में एकल प्रस्तुति ‘पण:’ ने किया मंत्रमुग्ध: रविन्द्र भवन में आयोजन के तीसरे दिन ‘धन और ज्ञान की विजय’ की प्रस्तुति – Bhopal News

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रूपक महोत्सव में एकल प्रस्तुति ‘पण:’ ने किया मंत्रमुग्ध:  रविन्द्र भवन में आयोजन के तीसरे दिन ‘धन और ज्ञान की विजय’ की प्रस्तुति – Bhopal News

रूपक महोत्सव में एकल प्रस्तुति ‘पण:’ ने किया मंत्रमुग्ध: रविन्द्र भवन में आयोजन के तीसरे दिन ‘धन और ज्ञान की विजय’ की प्रस्तुति – Bhopal News

अखिल भारतीय रूपक महोत्सव के तीसरे दिन गुरूवार को विविध रंगों में रंगी एकल और सामूहिक नाट्य प्रस्तुतियों ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इस दिन का प्रमुख आकर्षण में एकल प्रस्तुति “पण:” (शर्त) ने न केवल उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि धन और ज्ञान

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रविन्द्र भवन में चल रहे चार दिवसीय महोत्सव में आज तीन महत्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ। सर्वप्रथम डॉ. यतींद्र विमल चतुर्धुरीण द्वारा रचित ‘महिमामयभारतम’ नाटक प्रस्तुत किया गया, जो भारत की प्राचीन नदी सभ्यताओं और उनके मानव जीवन पर प्रभाव को दर्शाता है। दूसरी प्रस्तुति पश्चिम बंगाल के कालियाचक बिक्रम किशोर आदर्श संस्कृत महाविद्यालय द्वारा दी गई। विभा क्षीरसागर द्वारा रचित ‘आश्चर्यकरमेव’ नाटक ने वर्तमान समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और स्वार्थपरता पर प्रहार किया। इस नाटक में अण्वेषा दिण्डा ने कुलवधू, पार्थ सारथी पण्डा ने आरक्षक एवं पुरोहित, अनुश्री जाना ने लक्ष्मी और सौभिक पण्डा ने नेता की भूमिका निभाईं। तीसरा नाटक ‘विषमपरिणयम’ था, जिसे हिमाचल प्रदेश के सनातन धर्म आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, उना के कलाकारों ने प्रस्तुत किया। गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान गणेश शंकर द्वारा लिखित इस नाटक ने समाज में महिलाओं की स्थिति और न्याय के लिए उनके संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

संस्कृत नाटकों में आधुनिक संवेदनाओं का समावेश करते हुए, महाराष्ट्र के कवि कुलगुरू कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय से आई नाट्य दल ने “विकसितुएषाकलिका” नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें कन्याओं की सुरक्षा के विषय को प्रमुखता से रखा गया।

इसी दिन, कर्नाटका के केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रृंगेरी ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक “ए मिड समर नाइट्स ड्रीम” का संस्कृत रूपांतरण “वासंतिकस्वप्नम” प्रस्तुत किया। 19वीं शताब्दी के संस्कृत विद्वान कृष्णम्माचार्य द्वारा किये गये इस रूपांतरण में इंदु शर्मा, कनकलेखा, सौदामिनी और मकरंद आदि चरित्रों ने मंच को अपने भावपूर्ण अभिनय से जीवंत कर दिया।

वहीं त्रिपुरा के एकलव्य परिसर से आए नाट्य दल ने “शम्बूकाभिषेकम” की प्रस्तुतियां दी। इस रूपक में महेंद्र पाल ने समस्त दर्शकों का दिल जीत लिया। शम्बूक नामक शबर राजकुमार के अभिषेक की कथा पर आधारित इस नाटक में आंध्र प्रदेश की शबर संस्कृति को दर्शाया गया।

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महोत्सव के तृतीय दिन कोटभलवाल ,जम्मू के केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय , रणवीर परिसर ने भासोहास नामक नाटक की प्रस्तुति दी ।इस तीन अंक के नाटक को डॉ गजानंद बालकृष्ण पलसुले ने लिखा है । भास के जीवन के एक वृत्तांत को दर्शाते हुए इस नाटक में प्राचीन भारत को मंच पर प्रस्तुत किया गया ।इस नाटक में कवि भास तथा उसके प्रतिद्वंद्वी वसुमित्र ने अपने-अपने अभिनय से दर्शकों के मन को जीत लिया ।

महोत्सव का अंतिम आकर्षण डॉ. चन्नबासव स्वामी हिरेमठ की शानदार एकल प्रस्तुति “पण:” रही, जिसमें उन्होंने शर्त (द बेट) नाटक के चार पात्रों को एक साथ निभाते हुए धन और ज्ञान के बीच के संघर्ष को प्रभावी तरीके से दर्शाया।

इस विशेष दिन में न केवल नाट्य कला की विविधता को महसूस किया गया, बल्कि सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर गंभीर मंथन भी हुआ। महोत्सव के अंतिम दिन यानि 14 फरवरी(शुक्रवार) को विभिन्न प्रस्तुतियां दर्शकों का मनोरंजन करेंगी। साथ ही समापन सत्र में विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा।

चौथा दिन-14 फरवरी(शुक्रवार)

कौण्डिन्यप्रहसनम्

पल्लीकमलम्

ओडिसी

नृत्यम् सम्पूर्तिसत्रम्

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