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‘धराली में काम करने आया था बेटा, अब कहां तलाशें’: गीली मिट्टी में मशीनें फंसने से रेस्क्यू मुश्किल, हाथों से खुदाई कर तलाश रहे डेडबॉडी

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‘धराली में काम करने आया था बेटा, अब कहां तलाशें’:  गीली मिट्टी में मशीनें फंसने से रेस्क्यू मुश्किल, हाथों से खुदाई कर तलाश रहे डेडबॉडी

‘धराली में काम करने आया था बेटा, अब कहां तलाशें’: गीली मिट्टी में मशीनें फंसने से रेस्क्यू मुश्किल, हाथों से खुदाई कर तलाश रहे डेडबॉडी

‘अचानक से सैलाब आया और अपने साथ सब बहा ले गया। उस दिन अगर बड़ी मम्मी ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा न होता तो मैं भी इसी मलबे में दबी होती। मैंने मौत को इतने करीब से देखा है कि मुझे रातों को नींद नहीं आ रही। आंखों के सामने सिर्फ वही मंजर घूमता रहता है।‘

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धराली की रहने वाली चाहत दवान अब यहां नहीं रहना चाहतीं। उनकी यही मांग है कि सरकार उन्हें कहीं और बसाए। गांव में बचे बाकी लोग भी यही चाहते हैं। दूसरी तरफ रेस्क्यू के बीच कई ऐसे लोग भी मिले, जो धराली से लौटने को तैयार नहीं हैं। वे मलबे में तब्दील हो चुके गांव में अपनों को तलाश रहे हैं।

UP के बिजनौर के रहने वाले लेखराज हाथ में 18 साल के बेटे योगेश की तस्वीर लिए भटक रहे हैं। वे कहते हैं, ‘बेटा काम करने आया था, अब उसे कहां तलाश करूं।’

धराली में लगातार 8 दिन से रेस्क्यू चल रहा है। मलबा हटाकर अंदर दबे शवों को निकालने की कोशिश की जा रही है। अब तक रोड कनेक्टिविटी न हो पाने की वजह से खुदाई के लिए बड़ी मशीनें नहीं पहुंच पाई हैं। खुदाई में लगीं छोटी मशीनें गीली मिट्टी में फंस रही हैं। इसलिए हाथों से ही खुदाई की जा रही है।

धराली अब पूरी तरह से मलबे में तब्दील हो चुका है। जो मकान खड़े नजर आ भी रहे हैं, वो भी रहने लायक नहीं बचे हैं।

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दैनिक NEWS4SOCIALधराली में ग्राउंड जीरो पर पहुंचा और रेस्क्यू का काम देखा। इसमें लगी टीमों से बात की। हम गांववालों और उन लोगों से भी मिले, जो अपनों की तलाश में धराली पहुंचे हैं।

बेटा धराली में काम करने आया था, उसका पता नहीं चल रहा UP के बिजनौर के रहने वाले लेखराज धराली के पथरीले मलबे पर 18 साल के बेटे योगेश की तस्वीर लिए भटक रहे हैं। वे बताते हैं कि योगेश धराली और आसपास के गांवों में जाकर वेल्डिंग का काम करता था। उससे आखिरी बार 3 अगस्त को बात हुई थी। वे बताते हैं,

5 अगस्त को मैंने धराली की खबर टीवी पर देखी। तुरंत बेटे को फोन लगाया, लेकिन फोन बंद आया। मैंने उसके ठेकेदार को फोन लगाया, लेकिन उससे भी कुछ पता नहीं चला। उसने योगेश को अपनी गाड़ी की तरफ भागते देखा था।

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खबर सुनते ही लेखराज उत्तरकाशी के लिए निकल पड़े। वहां से सरकारी हेलिकॉप्टर के जरिए धराली पहुंचे। अब बेटे की तस्वीर लिए यहां-वहां भटक रहे हैं। कभी खुदाई कर रहे जवानों से पूछते हैं, कभी गांव के लोगों से। कभी सरकारी लिस्ट खंगालते हैं तो कभी थककर पत्थरों पर बैठ जाते हैं।

लेखराज ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। वे मजदूरी करते हैं। परिवार में 4 बेटियां और एक बेटा है। छोटे बेटे योगेश के लापता होने से परिवार गम में डूबा है।

लेखराज भी अब बेटे के जिंदा होने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। वो अब बस यही चाहते हैं कि बेटे की डेडबॉडी ही मिल जाए, ताकि उनका परिवार उसे अंतिम विदाई दे सके।

दलदल में छोटी मशीनें चलना मुश्किल, हाथ से हो रही खुदाई धराली में आपदा के तुरंत बाद 2 लाशें मिली थीं, लेकिन वो मलबे से बाहर ही थीं। उसके बाद से अब तक मलबा खोदकर एक भी लाश नहीं मिल सकी है। यहां राहत और बचाव काम चल रहा है लेकिन अब भी ज्यादातर खुदाई बिना मशीनों के हो रही है।

करीब 80 एकड़ में फैला मलबा 30-40 फीट ऊंचा है। मलबे में बड़ी-बड़ी चट्टानों के साथ पत्थर तो हैं ही, साथ में बहकर आई मिट्टी और रेत खुदाई में सबसे बड़ी बाधा बन रही है।

धराली में NDRF और SDRF की टीमें रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही हैं।

मिट्टी की वजह से धराली के कुछ हिस्सों में दलदल जैसी स्थिति है। यहां खुदाई के काम में लगी मशीनें काम नहीं कर पा रही हैं। धराली में खुदाई के लिए 4 मशीनें यानी एक्सकेवेटर लगाई गई हैं। उसमें से भी एक मशीन गीली मिट्टी में फंस गई है। बाकी मशीनें काम कर रही हैं, लेकिन ज्यादा गहरी खुदाई नहीं कर पा रही हैं।

ये मशीनें जहां से मलबा हटाती हैं, आसपास से गीला मलबा फिर इकट्ठा हो जाता है। दूसरी बात धराली तक अब भी रोड कनेक्टिविटी नहीं हो सकी है। इस वजह से खुदाई के लिए बड़ी मशीनें पहुंच नहीं पा रही हैं। लिहाजा राहत और बचाव का काम अब भी हाथ से खुदाई पर ही टिका हुआ है।

धराली में कुछ छोटी मशीनों से खुदाई का काम किया जा रहा है लेकिन उसमें भी मुश्किलें आ रही हैं।

नेपाल से आए 8 में से 7 मजदूर मलबे में दबे नेपाल से आए मजदूर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन( BRO) के लिए काम करते हैं। हालांकि, अभी धराली में गैंती-फावड़ा से खुदाई कर मलबा हटा रहे हैं। वे कहते हैं, ‘ये मलबा इतना ऊंचा है कि हम हाथ से सिर्फ ऊपर-ऊपर ही खुदाई कर पा रहे हैं। यहां बिना मशीन के खुदाई कर पाना मुमकिन नहीं है। जो मशीनें हैं, वो फंस रही हैं। हम गीली मिट्टी वाली जगहों पर पत्थर डाल रहे हैं ताकि मशीनें चल सकें।’

धराली और आसपास के इलाकों में नेपाल से बड़ी तादाद में लोग मजदूरी करने आते हैं। नेपाल के रहने वाले सुरेंद्र उनमें से एक हैं। वो यहां सेब के बागानों में काम करते थे। सुरेंद्र खुशनसीब हैं कि 5 अगस्त की सुबह 11 बजे उन्हें काम से धराली से बाहर जाना पड़ा और वो आपदा की चपेट में आने से बच गए। हालांकि, धराली में रह गए 7 दोस्तों से उनका साथ शायद हमेशा के लिए छूट गया।

सुरेंद्र अब धराली में बने राहत हेल्प डेस्क में लापता दोस्तों की तलाश करने पहुंचे हैं। वे बताते हैं, ‘जब पहली बार सैलाब आया, तब मेरे दोस्तों ने ही फोन करके उसके बारे में बताया। वो सब आपदा के एक घंटे बाद तक जिंदा थे। जब दूसरी बार मलबे का सैलाब आया, तब वो घर भी नहीं बच सका, जहां उन्होंने शरण ली थी।’

वे आगे कहते हैं, ‘मलबा बहुत सख्त और ऊंचा है, पता नहीं डेडबॉडी मिलेगी या नहीं।’ नेपाली मजदूरों के अलावा हमें बिहार से आए कुछ मजदूरों के परिवार वाले भी मिले, जो अपने परिजन को तलाश रहे हैं।

सरकार ने अब तक लापता हुए लोगों का कोई डेटा जारी नहीं किया है। आपदा के छठवे दिन DM प्रशांत आर्य ने SDM के नेतृत्व में एक जांच कमेटी बनाई है, जो आपदा में लापता हुए लोगों, घायलों और मृतकों की रिपोर्ट देगी।

जिला प्रशासन की ओर से हेल्प डेस्क बनाई गई है। यहां अपने परिजन की तलाश करते लोग पहुंच रहे हैं।

रेस्क्यू में पारंपरिक तरीके और नई टेक्नोलॉजी दोनों का इस्तेमाल धराली में NDRF, SDRF, ITBP, सेना, पुलिस और प्रशासन मिलकर राहत और बचाव का काम कर रहे हैं। सिर्फ NDRF के ही 114 जवान अभी ग्राउंड जीरो पर हैं और मलबे में दबे लोगों को रेस्क्यू करने की कोशिश कर रहे हैं। मलबे में दबे लोगों को तलाशने के लिए टेक्नोलॉजी के साथ पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

NDRF कमांडेंट सुदेश कुमार ने बताया, ‘हमारे पास जितनी मशीनें और तकनीक थी, वो धराली के रेस्क्यू में लगा दी है। इसमें ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार, रेस्क्यू रडार, विक्टिम लोकेटिंग कैमरा, रोटरी रेस्क्यू सॉ, थर्मल इमेजिंग कैमरा और हाइड्रोलिक स्प्लिट कटर जैसे टेक्नोलॉजी शामिल हैं।‘

‘हालांकि पत्थर और गीली मिट्टी की वजह से चुनौती बनी हुई है। हम मशीनों के जरिए जगहों की पहचान करके खुदाई का काम कर रहे हैं। हमने एक टीम पहाड़ों पर भी भेजी है, ताकि वो रेकी करके पता कर सके कि कहीं फिर कोई लैंडस्लाइड होने की आशंका तो नहीं है।‘

‘ऊंची-ऊंची बिल्डिंग मलबे में दब गई हैं। अब तक रोड न बन पाने की वजह से भारी मशीनें नहीं आ पाई हैं। हमारे 6 कैडेवर डॉग्स रेस्क्यू में लगे हुए हैं। मलबा कहीं-कहीं 50 फीट तक ऊंचा है, इसलिए ये बड़ी चुनौती है।’

NDRF के अलावा राज्य की आपदा एजेंसी SDRF के साथ उत्तराखंड पुलिस मिलकर राहत बचाव के काम कर रही है। डिप्टी SP स्वप्लिन मुयाल बताते हैं, ‘गीली मिट्टी रेस्क्यू में चुनौती बनी हुई है, जिसकी वजह से काम रफ्तार ही नहीं पकड़ पा रहा है। एक तरफ से हम मलबा हटा रहे हैं, दूसरी तरफ से मलबा आ जा रहा है। हमारी एक मशीन मिट्टी में फंस चुकी है।’

धराली गांव से 200 मीटर दूर जा खिसके घर, अंदर भरा मलबा धराली गांव का ज्यादातर हिस्सा मलबे में दफ्न हो चुका है। यहां का मेन मार्केट, दुकानें, होटल और रेस्टोरेंट मलबे के नीचे कहां पर हैं। इसका अंदाजा तो धराली में रहने वाले लोग भी नहीं लगा पा रहे हैं। सैलाब इतना तेज था कि घर कई-कई मीटर दूर जा खिसके हैं। एक घर तो गांव से करीब 200 मीटर दूर तक जा खिसका। ऊंचाई वाले हिस्से पर मौजूद कुछ मकानों की सिर्फ छत नजर आ रही है।

धराली में ज्यादातर मकान, दुकानें, होटल और रेस्टोरेंट मलबे में दब गए। जो कुछ ऊंचाई पर थे उनकी भी सिर्फ छतें ही नजर आ रही हैं।

धराली का जो ऊपरी हिस्सा पहाड़ों की तलहटी में था, वहां कुछ घर अब भी बचे हुए हैं। यहीं मौजूद मंदिर पर 5 अगस्त को घटना वाले दिन हारदूध मेला लगा था। ज्यादातर गांव वाले मंदिर और मेले में ही थे। इसी वजह से कुछ लोगों की जान बच गई। इन्हीं में से एक चाहत दवान हैं।

चाहत 11वीं में पढ़ती हैं। धराली में आई आपदा में उनके मकान को भी काफी नुकसान पहुंचा है। उनका छोटा सा 5 कमरों वाला अस्थाई रिसॉर्ट, सेब के बागान और खेत मलबे में समा गए हैं। अब उनकी सरकार से मांग है कि उन्हें कहीं और बसा दिया जाए।‘

धराली की रहने वाली चाहत दवान अब इस गांव में नहीं रहना चाहती हैं। वो और बाकी गांव वाले कहीं और बसाए जाने की मांग कर रहे हैं।

धराली की रहने वाली सुनीता पवार भी यही चाहती हैं। वे कहती हैं, ‘हमारे गांव के लोगों को अब दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए। लोगों के बाग-बगीचे, खेत, घर, दुकान, होटल सब कुछ खत्म हो गया। अब धराली में रहने का कोई मतलब नहीं है। बिना घर और रोजगार के हम यहां क्या करेंगे। सरकार को सर्वे कराना चाहिए और पुनर्वास कराना चाहिए।’

महेश पवार धराली में अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। उनके मकान के आसपास ही 15 और परिवार रह रहे थे। जब आपदा आई तब महेश भी मंदिर में चल रहे हारदूध मेले में गए हुए थे। वो बच गए, लेकिन उनका पुश्तैनी घर मलबे के नीचे दबा चुका है।

महेश कहते हैं, ‘हम चाहते हैं कि केदारनाथ की तर्ज पर धराली का भी पुनर्वास किया जाए। हमने सरकार को लंका, गोपांग और जागला तीन जगहों का सुझाव दिया है। ये जगह गंगोत्री के रास्ते में 10 किमी आगे हैं।’

‘हमारे गांव का एक साल में कम से कम 100 करोड़ रुपए का रोजगार था। बड़े-बड़े सेब के बागान, होटल, रेस्टोरेंट सारे रोजगार के साधन खत्म हो गए हैं। इसलिए पुनर्वास ही एक विकल्प है, जिससे हमें इस आपदा से राहत मिल सकेगी।’

धराली आपदा पर रिसर्च करेगा NIM धराली के लोगों की अब सबसे बड़ी चिंता ये है कि कम से कम गांव का जो हिस्सा सुरक्षित है, अब उस पर कोई संकट ना आए। इसके लिए पुख्ता सर्वे और रिसर्च हो। सरकार ने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग को अब धराली के ऊपर पहाड़ों के अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी है। NIM के इंस्ट्रक्टर दीप शाही करीब 3 दिन के लिए ऊपर पहाड़ों पर ग्राउंड सर्वे करने के लिए जा रहे हैं।

वे कहते हैं कि खीरगाड़ से ये पूरा मलबा आया है। हालांकि ये ग्लेशियर से काफी दूर है। वहां कई सारी छोटी-छोटी झीलें हैं। मुमकिन है कि उनके फूटने से ये आपदा आई हो। अब हम ऊपर ग्राउंड पर जाकर फिजिकल सर्वे करके इस आपदा की असली वजह पता करने की कोशिश करेंगे।

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धराली हादसे पर ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें.. लगा भूकंप आया और 40 सेकेंड में धराली तबाह, चश्मदीद बोले-लोग भाग भी नहीं पाए

5 अगस्त, मंगलवार की दोपहर पहाड़ों का मलबा बहकर आया और पूरा धराली उसमें दब गया। 5 लोग मारे गए, 100 से ज्यादा लापता हैं। सेना के 9 जवान भी बह गए। 50 से ज्यादा घर, 30 से ज्यादा होटल-रिजॉर्ट और 25 होम स्टे तबाह हो गए। धराली के लोग बताते हैं कि मलबा इतनी तेजी से बहकर आया कि किसी को बचने का मौका नहीं मिला। पढ़िए पूरी खबर…

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