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डॉ. अर्चना मुठ्ये का कॉलम: डेमोग्राफी की अच्छी समझ के बिना हम समस्याएं नहीं सुलझा सकते

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डॉ. अर्चना मुठ्ये का कॉलम:  डेमोग्राफी की अच्छी समझ के बिना हम समस्याएं नहीं सुलझा सकते

डॉ. अर्चना मुठ्ये का कॉलम: डेमोग्राफी की अच्छी समझ के बिना हम समस्याएं नहीं सुलझा सकते

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  • Dr. Arch Muthye’s Column: Without A Sound Understanding Of Demography, We Cannot Solve Problems

11 घंटे पहले

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डॉ. अर्चना मुठ्ये
इंडियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पापुलेशन की कार्यकारी परिषद सदस्य - Dainik Bhaskar

डॉ. अर्चना मुठ्ये इंडियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पापुलेशन की कार्यकारी परिषद सदस्य

भारत जनसंख्या वृद्धि की चुनौती का ही सामना नहीं कर रहा, तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय संतुलन की जटिल परिस्थितियों से भी गुजर रहा है। देश के सामने केवल यह प्रश्न नहीं है कि आबादी कितनी बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि आबादी की संरचना, वितरण, आयु-प्रोफाइल, प्रवासन-प्रवृत्तियां और संसाधनों पर उसका प्रभाव किस दिशा में जा रहा है।

यही कारण है कि जस्टिस नावलेकर की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय समिति को दूरदर्शी व समयानुकूल पहल माना जा रहा है। नि:संदेह समिति में प्रशासन, न्याय और नीति-निर्माण के क्षेत्र से जुड़े अनुभवी एवं विद्वान सदस्य सम्मिलित हैं। किंतु यदि इसमें प्रत्यक्ष रूप से डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाता, तो यह पहल और व्यापक तथा अकादमिक रूप से समृद्ध बन सकती है।

जनसंख्या संतुलन जैसे विषय केवल प्रशासनिक या राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे प्रजनन-संक्रमण, जनसंख्या-परिवर्तन, आयु-संरचना, प्रवासन-पैटर्न, निर्भरता-अनुपात, शहरीकरण प्रवृत्तियों तथा जनसंख्या-पूर्वानुमान जैसे जटिल जनसांख्यिकीय आयामों से जुड़े होते हैं। इन परिवर्तनों को समझने के लिए गणितीय-मॉडलिंग, दीर्घकालिक डेटा-विश्लेषण और सांख्यिकीय प्रक्षेपण की विशेषज्ञता आवश्यक होती है।

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यदि रोजगार-सृजन, शहरी-नियोजन और संसाधनों के प्रबंधन में संतुलन नहीं बना, तो हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड बोझ में भी परिवर्तित हो सकता है। इसी संदर्भ में अवैध प्रवासन का प्रश्न महत्वपूर्ण है। यह केवल आंतरिक या सीमा सुरक्षा का विषय नहीं है, बल्कि विकास, प्रशासन और संसाधन-प्रबंधन से भी सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। सरकारें अपनी योजनाएं जनगणना, सर्वेक्षणों और पंजीकृत आबादी के आधार पर बनाती हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, खाद्य-सुरक्षा, पेयजल, रोजगार और सामाजिक-कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा ढांचा इसी अनुमानित जनसंख्या पर आधारित होता है। किंतु जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में अवैध आबादी जुड़ जाती है, तो वास्तविक मांग और सरकारी योजना में अंतर पैदा हो जाता है। संसाधनों का अनियोजित बंटवारा होने से अनेक योजनाएं अपने मूल उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पातीं।

जब समिति का मूल विषय ही देश में जनसंख्या बदलाव से जुड़ी चुनौतियों का अध्ययन करके स्थायी समाधान और नीतिगत उपायों का सुझाव देना है तो उसमें जनसांख्यिकी विशेषज्ञों की प्रत्यक्ष भागीदारी क्यों नहीं है? भारत में इस क्षेत्र की विशेषज्ञता का अभाव नहीं है। कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान विश्वस्तरीय रिसर्च और जनसंख्या विश्लेषण के लिए जाना जाता है।

इसी प्रकार मुंबई के देवनार स्थित अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान जनसंख्या-अध्ययन, प्रजनन-स्वास्थ्य, प्रवासन, जनसांख्यिकीय-अनुसंधान और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे महत्वपूर्ण अध्ययनों का प्रमुख संस्थान है। इन संस्थानों में ऐसे अनेक विशेषज्ञ मौजूद हैं, जो जनसंख्या-परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों के वैज्ञानिक आकलन में सक्षम हैं।

वे यह समझने में भी सहायता करते हैं कि प्रवासन की वर्तमान प्रवृत्तियां भविष्य में किन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को जन्म दे सकती हैं। यही कारण है कि अनेक देशों में जनसंख्या संबंधी आयोगों और नीति समितियों में सांख्यिकीविदों, जनसांख्यिकी विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और प्रवासन विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। क्योंकि वे भी वैध-अवैध माइग्रेशन से जुड़ी हुई समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत की जनसांख्यिकीय विविधता भी व्यापक है।

विभिन्न राज्यों में प्रजनन-दर, जनसंख्या-घनत्व, आयु-वितरण और प्रवासन-पैटर्न में अंतर दिखता है। ऐसे में एक समान दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं हो सकता। क्षेत्रीय वास्तविकताओं को समझने के लिए डेटा-आधारित और वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता होती है। समिति का गठन करना गृह मंत्रालय की महत्वपूर्ण पहल है, किंतु जनसंख्या का प्रश्न केवल वर्तमान का नहीं, भविष्य का भी है और भविष्य की योजना तथ्यों, विज्ञान और दूरदृष्टि के आधार पर ही बनाई जा सकती है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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