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क्या महिलाओं के लिए बंद ही रहेंगे RSS के दरवाजे: पदाधिकारी बोले- राष्ट्र सेविका समिति ही काफी, प्रचारिका बोलीं- हम खुद संघ

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क्या महिलाओं के लिए बंद ही रहेंगे RSS के दरवाजे:  पदाधिकारी बोले- राष्ट्र सेविका समिति ही काफी, प्रचारिका बोलीं- हम खुद संघ

क्या महिलाओं के लिए बंद ही रहेंगे RSS के दरवाजे: पदाधिकारी बोले- राष्ट्र सेविका समिति ही काफी, प्रचारिका बोलीं- हम खुद संघ

‘परिवार और समाज में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होती है। देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी बढ़े, इसके लिए संघ से जुड़े संगठन कोशिश करेंगे। 11 क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं से कॉन्टैक्ट करने का फैसला किया गया है। अब तक 12 प्रांतों में कुल 73 सम्मेलन हु

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने 16 सितंबर 2023 को पुणे में अखिल भारतीय समन्वय बैठक में ये बयान दिया था। इसे संघ में महिलाओं की एंट्री के सीधे इशारे के तौर पर देखा गया। हालांकि, करीब डेढ़ साल का वक्त गुजर चुका है, लेकिन ऐसा कुछ जमीन पर नजर नहीं आया।

संघ के पदाधिकारी का मानना है कि राष्ट्र सेविका समिति के तौर पर महिलाओं का एक संगठन संघ की शाखा की तरह पिछले 89 साल से काम कर रहा है। ये रीति-नीति और उद्देश्य में ‘मिनी संघ’ जैसा ही है। सवाल ये है कि क्या समिति में काम करने वाली महिलाओं को कभी संघ में एंट्री मिलेगी। क्या महिलाओं के लिए संघ 1949 में अपनाया गया अपना संविधान बदलेगा?

इसे लेकर हमने संघ के बड़े पदाधिकारी और राष्ट्र सेविका समिति अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख रूपा रावल से बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

संघ में महिलाओं की एंट्री का न प्लान और न डिमांड संघ में महिलाओं की एंट्री को लेकर लगातार सवाल उठते हैं। संघ ने न कभी इनका खंडन किया और न कभी मंजूरी दी। हमने इसे लेकर संघ के राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े पदाधिकारी से सवाल किया कि क्या कभी संगठन में महिलाएं बड़े पदों पर दिखेंगी? क्या कभी सर संघचालक का पद संभालेंगी? जवाब मिला- ‘इस पर चर्चा होती रहती है, लेकिन अब तक ऐसा कोई प्लान बना नहीं है।’

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‘हमारा एक आनुषांगिक संगठन राष्ट्र सेविका समिति है। ये सिर्फ महिलाओं के लिए ही है। संघ जो काम करता है, वही काम समिति भी करती है। अब तक एक बार भी समिति के अंदर से ऐसी कोई डिमांड नहीं आई। जब आएगी तो इस पर बातचीत जरूर करेंगे।’

हम खुद संघ, महिलाओं की एंट्री के सवाल बेमतलब इन सवालों के जबाव तलाशने के लिए हम दिल्ली में हुए 15 दिवसीय प्रदेश शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में पहुंचे। इसमें राष्ट्र सेविका समिति की 137 सेविकाएं भी शामिल हुईं। यहां हम राष्ट्र सेविका समिति अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख रूपा रावल से मिले।

हमने पूछा कि संघ के बड़े पदों पर महिलाएं क्यों नहीं हैं? क्या समिति की तरफ से कभी कोई डिमांड नहीं हुई? इस पर मुस्कुराते हुए रूपा रावल कहती हैं,

हम संघ से ये गैरवाजिब और बेकार की डिमांड क्यों करेंगे। हम तो खुद संघ हैं। उसका हिस्सा हैं। संघ पुरुषों के बीच काम करता है और हम महिलाओं के बीच। बस इतना ही फर्क तो है। जब उन्हें हमारी जरूरत होती है, या हमें उनकी जरूरत होती है तो हम मिलकर काम करते हैं।

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रूपा रावल संघ में महिलाओं की एंट्री के सवाल को बेमतलब बताती हैं। वे कहती हैं, ‘क्या कभी कोई महिला कहेगी कि उसे मेन्स क्रिकेट टीम का कैप्टन बनना है। इसका मतलब ये नहीं कि महिलाएं क्रिकेट नहीं खेलतीं। बल्कि ये है कि उनकी टीम अलग है। खेलते दोनों क्रिकेट ही हैं।’

‘ये वैसा ही सवाल हुआ कि कोई पूछे कि श्री हरि के दशावतार में कोई देवी क्यों नहीं? अरे दशावतार श्रीहरि विष्णु का है। विष्णु देव हैं, देवी नहीं। तो उनके अवतार भी देवों के ही होंगे। लेकिन देवी क्या देवों से कम हैं, उनकी भी दश शक्तियां हैं। इसी तरह समिति महिलाओं का संगठन है, जैसे- संघ बंधुओं (भाइयों) का है।’

समिति खुद एक संगठन, हम संघ में जाने की डिमांड क्यों करेंगे? रूपा रावल आगे कहती हैं, ‘हमारी समिति की भी प्रमुख संचालिका हैं, जैसे- संघ के सर संघचालक मोहन भागवत हैं। संघ में महिलाओं के न होने का मतलब ये नहीं है कि संघ में उन्हें जगह नहीं मिलती या संघ पुरुष वादी है। या फिर समिति पुरातनवादी है, जो ऐसी मांग ही नहीं करती।’

‘बल्कि ये मतलब है कि संगठन के तौर पर समिति अपना काम वैसे ही कर रही है, जैसे संघ कर रहा है। आप ही सोचिए कि जब हमारा संगठन है तो हम संघ में बड़े पदों की मांग क्यों करेंगे?’

‘जहां संघ को लगता है कि समिति की जरूरत है तो वो हमसे बात करते हैं, जहां समिति को लगता है कि संघ की जरूरत है, हम उनसे बात करते हैं। संघ के सेवाकार्यों, संपर्क और जागरण कार्यक्रमों में महिलाओं तक पहुंचने के लिए समिति की प्रचारिकाएं, सेविकाएं और विस्तारिकाएं ही जाती हैं।

रुपा रावल जोर देकर कहती हैं, ‘हमारी सिर्फ शाखा की जगह अलग हैं, क्योंकि इसमें शारीरिक गतिविधियां होती हैं। महिलाओं और पुरुषों की स्ट्रेंथ अलग है, कम्फर्ट लेवल भी अलग है। बाकी संघ समिति दोनों एक दूसरे का हिस्सा हैं। हालांकि, ये व्यवस्था अभी के लिए है। अगर आगे जरूरत होगी तो व्यवस्था बदल भी सकती है।’

संघ में महिलाओं की एंट्री लोगों का गढ़ा एक मिथक दिल्ली प्रांत में समिति की संचालिका चारू कालरा महिलाओं की संघ में एंट्री के सवाल को क्रिएटेड मिथ बताती हैं। वो कहती हैं, ‘संघ में महिलाओं का न होना और संघ पर पुरुष वादी छवि का ठप्पा लगाना लोगों का बनाया एक मिथक है।’

‘हाल ही ये भी कहा गया कि संघ ने अब महिलाओं को मंच पर लाकर पुरुष वादी छवि तोड़ने की कोशिश की है। आपने भी यही पूछा कि 2022 में पर्वतारोही संतोष यादव को संघ के मंच पर लाने के पीछे क्या पुरुष वादी छवि को तोड़ना था? मैं इन सवालों का बस यही जवाब दूंगी कि ऐसे कई प्लेटफॉर्म हैं, जिसमें समिति की महिलाएं और संघ के बंधु मिलकर काम करते हैं।’

‘संघ को महिलाओं से कोई परहेज नहीं। अगर ऐसा होता तो समिति ही नहीं बनाई गई होती। समिति संघ की प्रेरणा और रीति-नीति से बना संगठन है। ये महिलाओं के नेतृत्व वाला और महिलाओं के लिए बना संगठन है। संघ और समिति दोनों का काम एक है।’

चारू समिति की स्ट्रेंथ को समझाने के लिए एक किस्से से अपनी बात खत्म करती हैं। वे बताती हैं, ‘राष्ट्र सेविका समिति की पहली संचालिका और फाउंडर लक्ष्मीबाई केलकर के पास एक सेविका जेठी देवानी का संदेश आया। कहा कि समिति की 1200 सेविकाएं बंटवारे के बाद कराची के हिस्से वाले क्षेत्र में चली गई हैं। इन सेविकाओं का भरोसा डगमगा रहा है। माहौल भी बहुत भयावह है।’

‘ये सुनने के बाद लक्ष्मीबाई जी ने सेविका वेणु ताई को अपने साथ लिया और कराची उन सेविकाओं से मिलने पहुंच गईं। ये 14 अगस्त 1947 के आसपास की बात है। उस वक्त माहौल कैसा था ये बताने की जरूरत नहीं। वे प्लेन के जरिए मुंबई से कराची पहुंची थीं। तब प्लेन में सिर्फ वही दोनों महिलाएं थीं, बाकी सब पुरुष थे। बताइए इतना सक्षम होने के बाद हमारी किसी भी सेविका या कार्यकर्ता को कहीं और जाने की क्या जरूरत है?’

संघ से समिति की उम्र सिर्फ 11 साल कम, विस्तार में कई गुना फर्क संघ की स्थापना 1925 में हुई, तो समिति की 1936 में। दोनों के बनने में फर्क सिर्फ 11 सालों का है, लेकिन विस्तार में कई गुना ज्यादा फर्क है। देशभर में संघ की 83 हजार 179 शाखाएं हैं, जबकि समिति की महज 4 हजार 125 शाखाएं हैं। देश में संघ के प्रचारकों की संख्या 2500 से ज्यादा है, तो समिति में प्रचारिकाओं की संख्या सिर्फ 45 और विस्तारिकाओं की 100 है।

अगर सेविका और स्वयंसेवकों की बात करें तो समिति के आकलन के मुताबिक, करीब 4 लाख सेविकाएं हैं। वहीं, संघ के स्वयंसेवक करीब 83 लाख से ज्यादा हैं। RSS या उससे जुड़े संगठन अनरजिस्टर्ड हैं। लिहाजा, रजिस्ट्रेशन न होने की वजह से सेविका और स्वयंसेवकों का सटीक डेटा नहीं है।

समिति की सह प्रचार प्रमुख रूपा रावल कहती हैं, ‘हम एक गैर रजिस्टर्ड संगठन हैं। इसलिए सेविकाओं के आंकड़े शाखा पट्ट के जरिए ही कैलकुलेट करते हैं। शाखा पट्ट यानी शाखा के वक्त पहना जाने वाला पट्टा। शाखा सदस्य वो भी है जो शाखा ध्वज को प्रणाम भी करके चला जाता है। अगर ये संख्या जोड़ेंगे तो आंकड़ा और भी ज्यादा होगा।‘

फिर संघ और समिति के विस्तार में इतना फर्क क्यों है? इस पर जवाब मिला, ‘सिर्फ समिति की शाखाओं में ही नहीं बल्कि महिलाओं की हर फील्ड में यही स्थिति दिखेगी। ये हमारी पूरी सोसाइटी की तस्वीर है। आप पत्रकारिता की बात करें या किसी और क्षेत्र की बात करें। पुरुष और महिलाओं का जो अनुपात दूसरी फील्ड में है, वही तो यहां पर भी होगा। समिति समाज से अलग नहीं है। वो समाज का ही संगठन है। इसलिए महिला-पुरुष का जो अनुपात दूसरे क्षेत्रों में है, वही यहां भी।‘

वे आगे कहती हैं, ‘महिलाओं के लिए घर से निकलकर समाज के लिए काम करना मुश्किल होता है। एक महिला को घर से निकालने के लिए हमें कई बार उसके घर जाना पड़ता है। उसके घर के लोगों को समझाना पड़ता है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि महिलाएं समाज के लिए सोचती ही नहीं हैं। समिति से बाहर भी कई महिलाएं समाज के लिए सोचती हैं और काम करती हैं।’

‘महिलाएं अब जैसे-जैसे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, वैसे ही राष्ट्र के काम में भी आगे बढ़ेंगी। समाज भी बदल रहा है, समिति में भी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। एक तथ्य और जानना चाहिए कि अगर एक घर से एक महिला सेविका है तो उसके घर में 5 लोगों तक हमारी बात पहुंचेगी। पुरुष अपने घर में उतना नहीं घुलता-मिलता जितना महिलाएं घुली-मिली होती हैं।’

राष्ट्र सेविका समिति कैसे करती है काम संघ की तरह ही समिति का मुख्यालय नागपुर में है। समिति की राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है। समिति की हेड को प्रमुख संचालिका कहते हैं। इसके नीचे प्रमुख कार्यवाहिका होती हैं और उनके नीचे 4 सह कार्यवाहिकाएं होती हैं।

ये अखिल भारतीय स्तर का स्ट्रक्चर है। यही प्रांत, राज्य और जिला स्तर का भी होता है। फिर 8 विभाग होते हैं। यही स्ट्रक्चर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी है। संघ की तरह ही समिति में भी पूर्ण कालिक और अंशकालिक प्रचारिका होती हैं।

वही लड़की या महिला प्रचारिका बन सकती है, जिसकी एजुकेशन पूरी हो चुकी हो और विवाहित न हो। हालांकि, इसका ये मतलब कतई नहीं है कि एक बार प्रचारिका बनने के बाद वो कभी विवाह नहीं कर सकती। विवाह के लिए कोई पाबंदी नहीं है। विवाह करने के बाद वो प्रचारिका की जगह विस्तारिका कहलाएगी।

समिति में जिसे जहां की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, वो वहीं रहता है। अगर किसी के पास अखिल भारतीय स्तर का दायित्व है, तो वो पूरे देश में घूमता है। जिसके पास क्षेत्रीय स्तर की जिम्मेदारी है, वो अपने क्षेत्र में रहता है। यही नियम प्रांत स्तर वाले पर भी लागू होता है।

संघ की तरह ही बैठकें समिति की बैठकें भी संघ की तरह ही होती हैं। जुलाई में प्रतिनिधि मंडल की बैठक होती है। ये सबसे बड़ी बैठक है, जिसमें कार्यकारिणी और विभाग स्तर के लोग शामिल होते हैं। फरवरी में कार्यकारिणी मंडल की कार्यकताएं आती हैं। इसमें क्षेत्र, प्रांत कार्यवाहिका और सह कार्यवाहिका आती हैं। इसमें विभाग की महिलाएं नहीं आती हैं।

16-17 घंटे की होती है समिति की वर्ग ट्रेनिंग समिति की ट्रेनिंग सुबह 4.30 से रात 10 बजे तक चलती है। शारीरिक ट्रेनिंग का सेट सिलेबस है। इसमें सेल्फ डिफेंस सिखाया जाता है। पहले खड्ग यानी तलवार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी, अब 2-3 साल पहले से इसकी जगह येष्टि चलाना सिखाया जा रहा है। ये एक छोटा सा दण्ड (डंडा) है।

– अब छुरिका यानी चाकू चलाना-सिखाना भी बंद कर दिया गया है। इसकी जगह कराटे सिखाना शुरू किया है। ये किसी शस्त्र के बगैर सेल्फ डिफेंस की एक्सरसाइज है।

– घोष यानी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें 2-3 साल पहले हमने वेणु सिखाना शुरू किया। ये बांसुरी जैसा होता है। इसके अलावा और भी कई इंस्ट्रूमेंट्स हैं।

– बौद्धिक यानी समसामयिक और कुछ खास विषयों पर चर्चा कराई जाती है। इसके अलावा चक्रीय बैठक यानी विमर्श, चर्चा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और वक्ताओं के कार्यक्रम कराए जाते हैं।

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