अस्तित्व के संकट से जूझ रही शहनाई-नगाड़ा कला: कलाकारों ने सरकार से लगाई संरक्षण की गुहार, आधुनिक दौर में कम हुए कद्रदान – jhalawar News h3>
झालावाड़ और आसपास के क्षेत्रों में पारंपरिक शहनाई-नगाड़ा कला आज अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। कभी राजगढ़ों, किलों और मांगलिक आयोजनों की पहचान रही यह लोक कला आधुनिक दौर में अपनी चमक खोती जा रही है। कार्यक्रमों में अवसर कम होने और सरकारी सहयोग के अभाव में कलाकारों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। लोक कलाकारों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला तो यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने से पहले ही लुप्त हो सकती है। कभी सम्मान और रोजगार का प्रमुख साधन थी कला पड़ोसी बारां जिले के सारथल गांव निवासी लोक कलाकार दिनेश राव बताते हैं कि एक समय था जब विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों और अन्य शुभ अवसरों पर शहनाई और नगाड़ा वादन के बिना कार्यक्रम अधूरा माना जाता था। कलाकारों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था, जिससे उनकी आजीविका भी सम्मानपूर्वक चलती थी। लेकिन बदलते समय के साथ ऐसे अवसर लगातार कम होते गए हैं। सरकारी आयोजनों में भी नहीं मिल रहे पर्याप्त अवसर दिनेश राव का कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों में भी लोक कलाकारों को पहले की तुलना में बहुत कम अवसर मिल रहे हैं। वर्तमान में शादी-विवाह के दौरान महफिल कार्यक्रम, ढोल-नगाड़ा वादन और साफा बांधने जैसे कार्यों से ही कुछ आय हो पाती है। इसके बावजूद वर्ष के अधिकांश समय रोजगार की कमी बनी रहती है, जिससे इस कला से जुड़े परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। पुश्तैनी विरासत को जीवित रखने की कोशिश 50 वर्षीय दिनेश राव ने बताया कि उनके पिता छित्तरलाल ने अपना पूरा जीवन शहनाई-नगाड़ा कला को समर्पित किया था। लगभग 14 वर्ष पहले उनके निधन के बाद अब वे इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह करीब 10 वर्ष की उम्र से अपने पिता के साथ कार्यक्रमों में जाने लगे थे और वहीं से इस कला की बारीकियां सीखीं। नई पीढ़ी तक पहुंच रही परंपरा आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद दिनेश राव अपने परिवार के साथ इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके चारों बच्चे इस कला से जुड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, उनका 10 वर्षीय पोता लखन भी स्कूल की पढ़ाई के साथ कार्यक्रमों में पहुंचकर सहयोग करने लगा है। इससे यह पारंपरिक विरासत नई पीढ़ी तक पहुंच रही है और कला को जीवित रखने की उम्मीद बनी हुई है। देश के कई शहरों में दिखा चुके हैं हुनर दिनेश राव ने बताया कि वे भोपाल, उज्जैन, खंडवा, इंदौर, जयपुर और जोधपुर सहित कई शहरों में विवाह समारोहों और अन्य आयोजनों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। हालांकि यह काम मुख्य रूप से नवंबर से अप्रैल तक ही मिलता है। शेष समय उन्हें परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता है। कलाकारों ने मांगा संरक्षण और आर्थिक सहयोग लोक कलाकारों का कहना है कि यदि सरकार विशेष योजनाएं बनाकर पारंपरिक कलाकारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए, नियमित सरकारी आयोजनों में अवसर दे और लोक कलाओं के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए तो शहनाई-नगाड़ों जैसी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को बचाया जा सकता है। उनका मानना है कि इससे न केवल कलाकारों को रोजगार मिलेगा, बल्कि यह लोक परंपरा भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सकेगी।
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