लोनावला की मशहूर चिक्की को मिली GI टैग की पहचान, अब वैश्विक ब्रांड बनने की राह खुली
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लोनावला की पहचान से जुड़ी स्वादिष्ट चिक्की को अब एक आधिकारिक भौगोलिक पहचान मिल गई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, 'लोनावला चिक्की' को प्रतिष्ठि…
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लोनावला की पहचान से जुड़ी स्वादिष्ट चिक्की को अब एक आधिकारिक भौगोलिक पहचान मिल गई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, 'लोनावला चिक्की' को प्रतिष्ठित ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह टैग इस पारंपरिक मिठाई की गुणवत्ता और उसके खास भौगोलिक उद्गम को प्रमाणित करता है, जिससे स्थानीय कारीगरों और कारोबार को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
लोनावला की चिक्की सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि इस इलाके की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। भुशी डैम और टाइगर पॉइंट जैसे पर्यटन स्थलों पर आने वाला हर सैलानी इसका स्वाद जरूर चखता है। अब जीआई टैग मिलने से इसकी ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता और भी बढ़ जाएगी।
क्या है लोनावला चिक्की का इतिहास?
इस पौष्टिक मिठाई का इतिहास ब्रिटिश शासन काल से जुड़ा है। माना जाता है कि जब मुंबई-पुणे रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था, तब मजदूरों को तुरंत ऊर्जा देने के लिए गुड़ और मूंगफली से इसे तैयार किया गया था। धीरे-धीरे इसका स्वाद आम लोगों तक पहुंचा और यह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। आज इसकी प्रसिद्धि भारत से बाहर भी है।
स्थानीय कारोबार को मिलेगा बढ़ावा
इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए चिक्की व्यवसायी अंकित पारेख ने कहा कि जीआई टैग ने लोनावला चिक्की को एक मजबूत पहचान और बड़ा मंच दिया है। उन्होंने कहा, "अब इस पहचान का उपयोग कर भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कारोबार का विस्तार किया जा सकेगा।" अंकित ने बताया कि उनका 'नेशनल चिक्की' का कारोबार करीब 100 साल पुराना है और इस टैग से उनकी पारंपरिक कारीगरी को नई पहचान मिली है।
अंकित के अनुसार, यह सफलता उनके पिता अभय कुमार पारेख के चार साल के अथक प्रयासों का नतीजा है। उन्होंने इस प्रक्रिया में मार्गदर्शन के लिए प्रोफेसर गणेश का भी विशेष आभार व्यक्त किया, जिनके योगदान को उन्होंने इस सफलता के लिए महत्वपूर्ण बताया।
इनपुट: IANS



