बुधवार, 5 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश

संभल हिंसा जांच रिपोर्ट विधानसभा में पेश: आयोग ने सुनियोजित साज़िश बताया, कई नेताओं की भूमिका पर सवाल

उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद में हुए ASI सर्वे के दौरान भड़की हिंसा एक पूर्व नियोजित साज़िश थी। इसका मकसद न सिर्फ़ अदालती प्रक्रिया में बाधा डालना था, बल्कि घटना को…

संभल हिंसा जांच रिपोर्ट विधानसभा में पेश: आयोग ने सुनियोजित साज़िश बताया, कई नेताओं की भूमिका पर सवाल
(फोटो: IANS)

उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद में हुए ASI सर्वे के दौरान भड़की हिंसा एक पूर्व नियोजित साज़िश थी। इसका मकसद न सिर्फ़ अदालती प्रक्रिया में बाधा डालना था, बल्कि घटना को सांप्रदायिक रंग देकर राज्य सरकार को बदनाम करना भी था। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह निष्कर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले न्यायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दिया है, जिसे उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर रखा गया।

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तीन सदस्यीय जांच आयोग की यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपे जाने के बाद सरकार ने इसे विधानसभा में पेश किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि अदालत के आदेश और सर्वे के असली मकसद को जानबूझकर छिपाया गया और लोगों में यह भ्रम फैलाया गया कि मस्जिद का अस्तित्व खतरे में है, जबकि अदालत ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था।

साज़िश और भीड़ जुटाने का आरोप

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, शाही जामा मस्जिद के सदर जफर अली, सचिव महशूद अली फारूकी और स्थानीय विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल समेत इंतेजामिया कमेटी के अन्य सदस्यों की भूमिका का ज़िक्र किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन लोगों ने ही लोगों से ASI सर्वे का विरोध करने के लिए मस्जिद में इकट्ठा होने का आह्वान किया था। आयोग का मानना है कि 19 नवंबर 2024 के पहले सर्वे और 24 नवंबर की हिंसा के बीच मिले समय का इस्तेमाल स्थानीय नेताओं और मस्जिद प्रबंधन ने भीड़ जुटाने के लिए किया।

हिंसा का मकसद और आयोग की सिफारिशें

रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि राजनीतिक वर्चस्व और मस्जिद प्रबंधन पर प्रभाव बनाए रखने के लिए लोगों को योजनाबद्ध तरीके से उकसाया गया। आयोग के अनुसार, भीड़ ने 'नारा-ए-तकबीर', 'अल्लाह-हु-अकबर' और 'गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा' जैसे नारे लगाते हुए सर्वे प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की, जिसके बाद पथराव और हिंसा हुई। आयोग ने कहा कि अदालत की प्रक्रिया में बाधा डालना और कानून हाथ में लेना राष्ट्रविरोधी गतिविधि की श्रेणी में माना जाना चाहिए।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि मस्जिद 1920 से ही ASI संरक्षित स्मारक है और सर्वे से उसके अस्तित्व को कोई खतरा नहीं था। अंत में, आयोग ने राज्य सरकार से सिफारिश की है कि इस सुनियोजित हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए और दोषियों को अपराध सिद्ध होने पर कठोर दंड, यहां तक कि आजीवन कारावास की सजा दी जाए।

इनपुट: IANS

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News4Social उत्तर प्रदेश डेस्क

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