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शिव के प्रचंड क्रोध ने दिया किस भव्य मंदिर को जन्म दिया?

1886

भगवान शिव के गण को समर्पित वीरभद्र मंदिर उत्तराखंड के ऋषिकेश के वीरभद्र नगर में स्थित है, जिसे भक्त वीर भद्रेश्वर मंदिर के नाम से प्रख्यात है। यह भव्य मंदिर करीब 1,300 साल पुराना मंदिर है, जहां वीरभद्र यानि भगवान शिव के एक रूप की पूजा -अर्चना की जाती है। शिवरात्रि और सावन के अवसर पर रात्रि जागरण और विशेष पूजाएं आयोजित बड़े उल्लास और बड़े स्तर पर आयोजन होता है। वीरभद्र भगवान शिव का भैरव स्वरूप मंदिर समर्पित है।

ऐसा माना जाता है की दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपमान होकर माँ सती ने आग में कूद कर अपनी जान दे दी। जब भगवान को इस घटना का बोध हुआ तो उनका प्रचंड रूप समाने आया वीरभद्र का क्रोध शांत नहीं हुआ, तब भगवान शिव ने इसी स्थान पर वीरभद्र का क्रोध शांत किया था और वीरभद्र ने ही यहां पर शिवलिंग की स्थापना हुई।

जो वीरभद्रेश्वर महादेव के नाम से प्रचलित है। वीरभद्रेश्वर मंदिर उत्तर कुषाण कालीन इंटिकाओ से निर्मित है, जिसके भद्रपीठ पर शिवङ्क्षलग विराजमान है। मंदिर के समीप ही रंभा नदी बहती है। पुराणों के अनुसार देवी सती के यज्ञ में भस्म हो जाने के कारण आक्रोशित शिव के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान इंद्र ने स्वर्गलोक की अप्सरा रम्भा को यहां भेजा था, जिसे शिव ने भस्म कर दिया। जो कालांतर में भी श्यामल रंग में बहती है।
दर्शन से दूर -दूर से लोग आते है और भगवान शिव के दर्शन पाकर तृप्त हो जाते है।

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