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नवरात्र के दूसरे दिन ‘ब्रह्मचारिणी’ स्वरूप में करें माता दुर्गा की पूजा

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नवदुर्गा के दूसरे स्वरूप में मां ब्रह्मचारिणी की पूजा कि जाती है, ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण अर्थात तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी। आदिशक्ति दुर्गा का द्वितीय स्वरूप साधको को अनंत शक्ति देने वाली है। कहते हैं मां ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। तपस्या के प्रथम चरण में उन्होंने केवल फलों का सेवन किया फिर बेलपत्र और अंत में निराहार रहकर कई वर्षो तक तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। माता ब्रह्मचारिणी की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के कमंडल से मानी जाती है।

मां ब्रह्मचारिणी की आराधना करने से जीवन के मुश्किल समय में भी साधक का मन कर्तव्य निष्ठा से परिपूर्ण और अविचलित रहता है। मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप परम खिलते हुए कमल जैसा है जिसमें से प्रकाश निकल रहा है परम ज्योर्तिमय है, ये शांत और निमग्न होकर तप में विलीन हैं। इनके मुखमंडल पर कठोर तप के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर करने में सक्षम है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्षमाला और बाएं हाथ में कमण्डल है।

देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्मत्व का स्वरूप हैं अर्थात ब्रह्मतेज का साकार स्वरूप हैं। इनके आज्ञा चक्र से तेज निकल रहा है जैसे की इनका ये इनका तीसरा नेत्र हो। ये गौरवर्णा हैं तथा इनके शरीर से हवन कि अग्नि प्रज्वलित हो रही है। इन्होंने धवल रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं। मां ने कमल को अपना श्रृंगार बना लिया है। इनके कंगन, कड़े, हार, कुंडल तथा बाली आदि सभी जगह कमल जड़े हुए हैं अतः जैसे स्वर्णमुकुट पर कमल की मुकुटमणि जड़ी हो।

पूजा के समय इस मंत्र का जाप अवश्य करें :-

या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता।

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नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥