पाकिस्तान: ईसाई दंपत्ति को ज़िंदा जलाने का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरी तीन दोषियों को भी बरी किया
पाकिस्तान में साल 2014 में एक ईसाई दंपत्ति को ईशनिंदा के झूठे आरोप में भीड़ द्वारा ज़िंदा जला दिए जाने के मामले में अब कोई भी दोषी नहीं बचा है। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इस हत्याकांड में मौत की…
पाकिस्तान में साल 2014 में एक ईसाई दंपत्ति को ईशनिंदा के झूठे आरोप में भीड़ द्वारा ज़िंदा जला दिए जाने के मामले में अब कोई भी दोषी नहीं बचा है। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इस हत्याकांड में मौत की सज़ा पाए आख़िरी तीन दोषियों को भी बरी कर दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक़, अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमज़ोर और सबूत पेश करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ बताईं।
यह भयावह घटना 4 नवंबर, 2014 को पंजाब प्रांत के कसूर ज़िले में हुई थी। 26 वर्षीय शहजाद मसीह और उनकी 24 वर्षीय गर्भवती पत्नी शमा बीबी एक स्थानीय ईंट-भट्टे पर मज़दूरी करते थे। उन पर कुरान के पन्ने की बेअदबी का झूठा आरोप लगाया गया था, जिसके बाद 1,000 से ज़्यादा लोगों की उग्र भीड़ ने उन्हें घेर लिया।
क्या हुआ था उस दिन?
ईंट-भट्टे के मालिक ने पैसों के विवाद के चलते दंपत्ति को भागने से रोक दिया था। इसी बीच, एक स्थानीय मस्जिद के लाउडस्पीकर से भीड़ को उनके ख़िलाफ़ भड़काया गया। गुस्साई भीड़ ने पति-पत्नी को बुरी तरह पीटा और प्रताड़ित करने के बाद उन्हें जलते हुए ईंट-भट्टे में फेंक दिया, जिससे उनकी मौत हो गई।
अदालती कार्यवाही और अंतिम फ़ैसला
इस मामले में शुरुआत में एक आतंकवाद-निरोधी अदालत ने पाँच लोगों को मौत की सज़ा और आठ अन्य को दो-दो साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। हालाँकि, समय के साथ सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए ऊपरी अदालतों ने ज़्यादातर दोषियों की सज़ा रद्द कर दी। 2018 में 20 और आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
अब 10 जुलाई को आए ताज़ा फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा पाए आख़िरी तीन दोषियों को भी बरी कर दिया। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने पंजाब सरकार की उस याचिका को भी ख़ारिज कर दिया जिसमें 102 अन्य आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। पाकिस्तान के कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस के प्रेसिडेंट बिशप सैमसन शुकार्डिन और फैसलाबाद के बिशप इंद्रियास रहमत ने इसे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा के बाद न्याय न मिलने का एक पैटर्न बताया है।
इनपुट: IANS



