मुंबई में दशहरा: पाँच दशकों से रावण के पुतले बना रहे हाफिजुद्दीन, कला और सौहार्द की मिसाल
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व जैसे-जैसे करीब आ रहा है, मुंबई में भी इसकी तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। शहर के सायन कोलीवाड़ा, गिरगांव चौपाटी और आजाद मैदान में रावण के विशाल पुतले बनाने का…
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व जैसे-जैसे करीब आ रहा है, मुंबई में भी इसकी तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। शहर के सायन कोलीवाड़ा, गिरगांव चौपाटी और आजाद मैदान में रावण के विशाल पुतले बनाने का काम शुरू हो गया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस कला के पीछे एक खास कहानी है, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाती है। पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय से, हाफिजुद्दीन अहमद नाम के एक मुस्लिम कारीगर अपनी टीम के साथ इन पुतलों को आकार दे रहे हैं।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के रहने वाले और वर्तमान में गौतम बुद्ध नगर जिले में रहने वाले हाफिजुद्दीन के लिए यह काम सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि एक शौक और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा भी है। वह अपनी टीम के साथ नोएडा और दिल्ली से मुंबई आते हैं, ताकि दशहरे के लिए समय पर भव्य पुतले तैयार कर सकें।
पीढ़ियों की कला और भाईचारे का संदेश
बांस, कागज और अन्य सामग्रियों का उपयोग करके रावण का ढांचा तैयार करने से लेकर उसकी सजावट तक, हर चरण में विशेष कौशल, धैर्य और कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है। हाफिजुद्दीन और उनकी टीम अपने लंबे अनुभव से हर साल इन कलाकृतियों को जीवंत करती है। उन्होंने IANS से बातचीत में कहा, "पुतले बनाने का मुझे शौक है और दूसरा यह कि इससे कमाई होती है। इसके अलावा, रावण के पुतले बनाने का मकसद यह है कि कैसे बुराई पर अच्छाई की विजय होती है।"
उनकी टीम के एक अन्य कारीगर ने बताया कि वह बचपन से यह काम देख रहे हैं और पिछले 20-25 सालों से मुंबई में पुतले बना रहे हैं। हाफिजुद्दीन की यह कला इस बात का प्रमाण है कि हुनर का कोई धर्म नहीं होता और यह लोगों को जोड़ने का काम करता है। मुंबई जैसे बहुसांस्कृतिक शहर में उनका यह योगदान सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान की भावना को और मजबूत करता है।
इनपुट: IANS



