हूल दिवस 2026: भोगनाडीह का वह बरगद जो 171 साल से संथाल क्रांति की गवाही दे रहा है
झारखंड के साहिबगंज जिले में एक बरगद का पेड़ है — पचकठिया का वह विशाल, सदियों पुराना बरगद, जिसकी छाल में शायद अब भी उस दिन की आहट दर्ज है। 30 जून 1855 को इसी पेड़ के नीचे एक ऐसी चिंगारी सुलगी थी, जिसने
झारखंड के साहिबगंज जिले में एक बरगद का पेड़ है — पचकठिया का वह विशाल, सदियों पुराना बरगद, जिसकी छाल में शायद अब भी उस दिन की आहट दर्ज है। 30 जून 1855 को इसी पेड़ के नीचे एक ऐसी चिंगारी सुलगी थी, जिसने संथाल परगना से बंगाल तक ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। मंगलवार को एक बार फिर हजारों लोग भोगनाडीह गाँव में उस इतिहास को नमन करने जुटेंगे।
IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष हूल दिवस पर राजकीय स्तर पर भी बड़ा आयोजन होगा और राज्य के कोने-कोने से लोग इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुँचेंगे। झारखंड में यह दिन महज़ एक स्मृति-समारोह नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान, प्रतिरोध और जन-अस्मिता का सबसे सशक्त प्रतीक माना जाता है।
20 हजार लोगों की सभा, और अंग्रेजों को खुली चुनौती
इतिहासकारों के अनुसार सिदो और कान्हू मुर्मू ने अपने भाइयों चांद व भैरव और बहनों फूलो व झानो के साथ मिलकर भोगनाडीह में करीब 20 हजार लोगों की विशाल सभा बुलाई थी। उसी मंच से अंग्रेजी शासन को क्षेत्र छोड़ने का खुला संदेश दिया गया। तीर-धनुष, फरसा और पारंपरिक हथियारों से लैस संथाल विद्रोहियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आधुनिक हथियारबंद सेना को कई मोर्चों पर कड़ी टक्कर दी। 16 जुलाई 1855 को पीरपैंती और 21 जुलाई को वीरभूम में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
क्या यह भारत का पहला संगठित स्वतंत्रता संग्राम था?
भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन जनजातीय इतिहास के शोधकर्ताओं की राय इससे अलग है — उनके मुताबिक उससे दो साल पहले भोगनाडीह से उठी यह आवाज़ अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध पहला व्यापक और सुनियोजित जनयुद्ध था। रांची स्थित रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के सेवानिवृत्त निदेशक और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रणेंद्र बताते हैं कि राजनीतिक दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने भी अपनी चर्चित रचना 'नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री' में संथाल हूल का उल्लेख किया है। उस दौर में लंदन से प्रकाशित कई अखबारों ने भी इस जनविद्रोह पर विस्तृत रिपोर्टें छापी थीं।
झारखंड इनसाइक्लोपीडिया के लेखक सुधीर पाल शोध दस्तावेजों के आधार पर बताते हैं कि यह आंदोलन किसी अचानक भड़की बगावत की तरह नहीं था — इसके लिए सैन्य टुकड़ियाँ, गुप्तचर तंत्र, रसद व्यवस्था और प्रचार दल तक गठित किए गए थे। यह केवल संथाल समुदाय का संघर्ष भी नहीं था; पहाड़िया, अहीर, लोहार और अन्य स्थानीय समुदाय भी इसमें कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।
50 हजार से अधिक सहभागी, दस हजार से ज़्यादा शहीद
लगभग 52 गाँवों के 50 हजार से अधिक लोगों ने इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भाग लिया। एक वर्ष से अधिक समय तक चले इस अभियान में दस हजार से ज़्यादा लोग शहीद हुए। विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर सैन्य बल झोंका। लड़ाई के दौरान चांद और भैरव शहीद हो गए। बाद में सिदो और कान्हू को गिरफ्तार कर फाँसी दे दी गई — सिदो को उसी पचकठिया के बरगद पर, जो आज भी इस पूरे इतिहास का मौन साक्षी बना खड़ा है, जबकि कान्हू को भोगनाडीह में फाँसी पर चढ़ाया गया।
डाक टिकट तो मिला, पर इतिहास में उचित स्थान अभी बाकी
वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सिदो-कान्हू की स्मृति में डाक टिकट जारी किया था। फिर भी जनजातीय समाज और इतिहासकारों का यह मानना बना हुआ है कि संथाल हूल को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अब तक वह स्थान नहीं मिल सका, जिसका वह वास्तविक हकदार है। भोगनाडीह के साथ-साथ पूरे झारखंड में मंगलवार को कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे — और पचकठिया का वह बूढ़ा बरगद एक बार फिर उन 171 साल पुरानी यादों का गवाह बनेगा।
इनपुट: IANS



