गुरूवार, 3 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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झारखंड की बंद कोयला खदानों को मिलेगी नई ज़िंदगी, सौर ऊर्जा से लेकर पर्यटन तक की योजना

झारखंड में कोयला खत्म होने के बाद बेकार छोड़ दी जाने वाली खदानों को अब आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू हो गया है। इस पहल के तहत बंद खदानों की…

झारखंड की बंद कोयला खदानों को मिलेगी नई ज़िंदगी, सौर ऊर्जा से लेकर पर्यटन तक की योजना
(फोटो: IANS)

झारखंड में कोयला खत्म होने के बाद बेकार छोड़ दी जाने वाली खदानों को अब आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू हो गया है। इस पहल के तहत बंद खदानों की ज़मीन, पानी और बुनियादी ढाँचे का इस्तेमाल स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के नए अवसर पैदा करने में किया जाएगा। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) और रामगढ़ ज़िले की करमा ओसीपी को चुना गया है।

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राज्य सरकार ने इन दोनों खदानों के पुनरुपयोग के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने पर सहमति बना ली है। यह कदम केंद्र के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड के संयुक्त सहयोग से चल रही एक परियोजना का हिस्सा है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य बंद हो चुकी कोयला खदानों के लिए एक स्थायी और व्यावहारिक मॉडल तैयार करना है।

पायलट प्रोजेक्ट की रूपरेखा

चुनी गई दोनों खदानों के लिए एक विस्तृत 'माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान' तैयार किया जाएगा। इसके तहत यह मूल्यांकन होगा कि खदान की ज़मीन और आसपास के संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जा सकता है। योजना में सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना, पर्यटन केंद्रों का विकास, कृषि, बागवानी और मछली पालन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देना शामिल है। इसके अलावा, कौशल विकास केंद्र और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा।

स्थानीय समुदायों पर ध्यान

इस योजना के केंद्र में स्थानीय समुदाय हैं। विशेष रूप से करमा ओसीपी के आसपास के आठ गाँवों—सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी—को इसमें शामिल किया गया है। इन गाँवों में लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और रोज़गार के मौजूदा साधनों का अध्ययन किया जा रहा है ताकि योजना उनकी ज़रूरतों के अनुरूप हो। एक विस्तृत डीपीआर भी तैयार की जाएगी, जिसमें भूमि उपयोग, पर्यावरण सुधार और खदान के गड्ढों के प्रबंधन की रणनीति शामिल होगी।

रांची में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल समेत राज्य सरकार, जीआईजेड, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, सीसीएल और सीएमपीडीआई के अधिकारियों ने इस योजना पर चर्चा की। सरकार का मानना है कि इस पायलट प्रोजेक्ट से जो मॉडल तैयार होगा, उसे भविष्य में झारखंड और देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों में भी लागू किया जा सकेगा। यह 'टेक्निकल कोऑपरेशन ऑन टू-बी-डोज्ड कोल माइंस' परियोजना मार्च 2030 तक चलेगी।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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