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किसानों द्वारा BJP नेताओं को गांव में ना आने देना क्या संवैधानिक है ?

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किसान आंदोलन
किसान आंदोलन

काफी लंबे समय से किसान आंदोलन चल रहा है. जिसमें किसान केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं. किसानों का मानना है कि ये कानून किसानों को बर्बाद कर देगें. इसके लिए लंबे समय से आंदोलन चलाया जा रहा है. लेकिन कई दौर की वार्ता के बाद अभी किसान और सरकार के बीच लंबे समय से वार्ता बंद हो चुकी है. इतने लंबे समय से आंदोलन चलने के बाद भी अभी इसका कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है. किसान नेता अपना आंदोलन तेज करने की चेतावनी दे रहे हैं. इसके साथ ही बीजेपी के नेताओं का विरोध कर रहे हैं.

किसान आंदोलन

पंजाब में एक विधायक के साथ बदसलुकी की गई. इसके साथ ही हरियाणा में भी बीजेपी नेताओं का विरोध किया जा रहा है. मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के कहीं सार्वजनिक स्थानों पर मीटिंग का जबरदस्त विरोध किया जा रहा है तथा इसके साथ ही उनको गांव में आने पर विरोध किया जाता है. इससे किसानों का गुस्सा साफ नजर आ रहा है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह संवैधानिक है ?

किसानों का विरोध

संविधान में सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है तथा विरोध करने का भी एक अधिकार होता है. लेकिन जहां तक विरोध की बात है, तो उसकी एक सीमा होती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि किसी नेता के भी लोकतंत्र में अपने कुछ अधिकार होते हैं, विरोध के नाम पर उनके साथ दुर्व्यवहार को भी सही नहीं ठहराया जा सकता है. लोकतंत्र में मतभेद होना आम बात है, उसका समाधान चर्चा से निकाला जाता है. यहीं लोकतंत्र की सभी बड़ी खुबी होती है.

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किसी नेता को गांव में ना आने देना संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है. अपने अधिकारों के लिए विरोध करना और आवाज उठाना जरूरी है. लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं का सम्मान और विरोध में सामंजस्य भी होना जरूरी होता है.