ईरान के तेल-दांव से अमेरिका पर बढ़ेगा दबाव, भारत के बजट पर भी पड़ सकता है असर: विशेषज्ञ
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुरिंदर सिंह लाली का मानना है कि ईरान ने अमेरिका को घेरने के लिए सीधा सैन्य टकराव करने के बजाय तेल की कीमतों को अपना हथियार बना लिया है। समाचार एजेंसी IANS के सा…
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुरिंदर सिंह लाली का मानना है कि ईरान ने अमेरिका को घेरने के लिए सीधा सैन्य टकराव करने के बजाय तेल की कीमतों को अपना हथियार बना लिया है। समाचार एजेंसी IANS के साथ बातचीत में उन्होंने चेताया कि इस रणनीति का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा, जो महंगाई के रूप में आम भारतीय की रसोई तक पहुंच सकता है।
लाली के विश्लेषण के मुताबिक, ईरान यह समझ चुका है कि अमेरिका से 8,000 किलोमीटर दूर जाकर हमला करने या मध्य-पूर्व में उसके ठिकानों को निशाना बनाने के बजाय, वैश्विक तेल बाज़ार में कीमतें बढ़ाना कहीं ज़्यादा असरदार तरीका है। चूंकि अमेरिका दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, इसलिए वहां पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतें सीधे आम नागरिक की जेब पर असर डालती हैं।
चुनाव और अमेरिकी राजनीति पर असर
विशेषज्ञ के अनुसार, तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा राजनीतिक दबाव अमेरिकी राष्ट्रपति पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि आगामी मध्यावधि चुनावों के मद्देनज़र यह स्थिति डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है, क्योंकि आंतरिक सर्वेक्षणों में भी उनकी जीत की संभावनाएं कम बताई जा रही हैं। लाली ने ट्रंप द्वारा डलास रैली में वोट के बदले 5,000 डॉलर देने के वादे का भी ज़िक्र किया, जिसे उन्होंने उनकी घटती लोकप्रियता का संकेत बताया।
लाली ने यह भी बताया कि अमेरिका के भीतर ही इस संघर्ष की प्रकृति को लेकर भ्रम है। एक ओर जहां ट्रंप इसे 'युद्ध' कहते हैं, वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इसे 'झड़पें' बता रहे हैं।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
सुरिंदर सिंह लाली ने स्पष्ट किया कि इस भू-राजनीतिक तनाव का भारत पर सीधा आर्थिक असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, "भारत एक ऊर्जा आयातक देश है, इसलिए इसका सीधा असर चालू खाते के घाटे, महंगाई और रुपए पर पड़ेगा।" तेल, पेट्रोलियम उत्पादों के साथ-साथ उर्वरक और हीलियम की कीमतें बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा दबाव बन सकता है।
बदलते वैश्विक समीकरण
इस संघर्ष ने दुनिया के अन्य देशों के लिए भी नए समीकरण बना दिए हैं। लाली के मुताबिक, चीन को बिना एक भी गोली चलाए अमेरिकी सैन्य क्षमताओं का 'मुफ्त केस स्टडी' मिल गया है, जो ताइवान के मामले में उसके काम आ सकता है। वहीं, कभी अलग-थलग पड़ा रूस अब तेल से पैसा कमाकर न केवल मुख्यधारा में लौट आया है, बल्कि अपने युद्धों के लिए फंडिंग भी जुटा रहा है। उन्होंने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों की स्थिति को 'सिर कटी मुर्गियों' जैसा बताया, जिन्हें लगता था कि उन्होंने पेट्रोडॉलर से अपनी सुरक्षा खरीद ली है।
इनपुट: IANS



