पाकिस्तान: हिरासत में प्रताड़ना आम, मानवाधिकार आयोग ने की कानून में सुधार की मांग
पाकिस्तान में हिरासत के दौरान दी जाने वाली शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना एक "व्यापक और सामान्य" समस्या बनी हुई है। देश के मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए सरकार से मौजूदा कानूनी…
पाकिस्तान में हिरासत के दौरान दी जाने वाली शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना एक "व्यापक और सामान्य" समस्या बनी हुई है। देश के मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए सरकार से मौजूदा कानूनी ढांचे को तत्काल मजबूत करने की मांग की है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने चेतावनी दी है कि पुलिस लॉकअप, जेलों और पूछताछ केंद्रों में इस तरह का दुरुपयोग नियमित रूप से हो रहा है।
मंगलवार को जारी अपने बयान में, एचआरसीपी ने इस बात पर जोर दिया कि जो लोग ऐसी प्रताड़ना से बच भी जाते हैं, उनके शारीरिक घाव तो भर सकते हैं, लेकिन मानसिक चोटें लंबे समय तक बनी रहती हैं। संगठन ने कहा, "पीड़ितों को पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस या मानहानि का सामना करना पड़ता है, जबकि लापता या मृत लोगों के परिवार न्याय के बिना दुख झेलते रहते हैं।"
कानून में संशोधन की जरूरत
एचआरसीपी ने सरकार से आग्रह किया है कि वह 'टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022' में संशोधन करे। आयोग की प्रमुख मांग है कि मानसिक यातना को एक अलग और स्पष्ट अपराध के रूप में मान्यता दी जाए। संगठन के मुताबिक, पाकिस्तान ने 2010 में संयुक्त राष्ट्र के यातना विरोधी कन्वेंशन को स्वीकार किया था और इसी के तहत 2022 में यह कानून बनाया गया, लेकिन यह अभी भी कमजोर है और इसका प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो रहा है, जिससे दोषियों को सजा नहीं मिल पाती।
न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल
मानवाधिकार संगठन ने जांच व्यवस्था में सुधार की भी वकालत की है। आयोग का कहना है कि जांच एजेंसियों को उन कानून प्रवर्तन एजेंसियों से स्वतंत्र होना चाहिए, जिन पर खुद ऐसे अत्याचारों में शामिल होने के आरोप हैं। एचआरसीपी ने आरोप लगाया, "कई मामलों में अदालतें यातना के जरिए हासिल किए गए सबूतों को स्वीकार कर लेती हैं, जिससे न्याय व्यवस्था के भीतर ही ऐसे दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता है।"
आयोग ने कहा कि जब यातना को बिना रोक-टोक के जारी रहने दिया जाता है, तो यह संस्थागत रूप ले लेती है और राज्य व्यवस्था में जवाबदेही की कमी को दर्शाती है। इससे उन संस्थानों की विश्वसनीयता भी कमजोर होती है, जिनका काम नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना है। गौरतलब है कि पिछले महीने भी एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई थी।
इनपुट: IANS



