मानसून की बेरुखी से तमिलनाडु में बिजली संकट, आधा रह गया पनबिजली उत्पादन, महंगी खरीद को मजबूर
तमिलनाडु इस साल गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है, जिसकी मुख्य वजह कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून है। बारिश की कमी और जलाशयों में पानी न होने के कारण राज्य का पनबिजली (Hydroelectric) उत्पादन लगभग आधा रह गया…
तमिलनाडु इस साल गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है, जिसकी मुख्य वजह कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून है। बारिश की कमी और जलाशयों में पानी न होने के कारण राज्य का पनबिजली (Hydroelectric) उत्पादन लगभग आधा रह गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस कमी को पूरा करने के लिए राज्य को पावर एक्सचेंज से कई गुना महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है, जिससे सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ा है।
आंकड़े इस संकट की गंभीरता को दर्शाते हैं। इस साल 1 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच राज्य में केवल 751.034 मिलियन यूनिट (MU) पनबिजली का उत्पादन हुआ। यह पिछले साल की इसी अवधि में हुए 1,509.549 मिलियन यूनिट उत्पादन के मुकाबले लगभग 50% कम है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब लंबी चली हीटवेव के कारण बिजली की मांग अपने चरम पर थी।
सबसे सस्ती बिजली से वंचित तमिलनाडु
पनबिजली को राज्य के लिए ऊर्जा का सबसे सस्ता स्रोत माना जाता है, जिसकी उत्पादन लागत प्रति यूनिट एक रुपये से भी कम आती है। आमतौर पर, तमिलनाडु गर्मी और अधिक मांग के समय इसी सस्ती बिजली पर निर्भर करता है ताकि महंगे स्रोतों से बचा जा सके। लेकिन इस बार जलाशयों में पानी की कमी ने इस व्यवस्था को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। नतीजतन, बिजली वितरण कंपनी को पिछले तीन महीनों में पावर एक्सचेंज से 16 से 20 रुपये प्रति यूनिट की ऊंची दर पर बिजली खरीदनी पड़ी। अधिकारियों के मुताबिक, इस दौरान करीब 2,000 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी गई, जिससे खरीद का खर्च काफी बढ़ गया है।
पानी की कमी और गाद की समस्या
कमजोर मानसून के अलावा, कर्नाटक से कावेरी नदी का पर्याप्त पानी न मिलना भी इस संकट को और गहरा कर रहा है। इससे उन जलाशयों में पानी की उपलब्धता और कम हो गई है, जिन पर कई पनबिजली परियोजनाएं निर्भर हैं। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर आने वाले हफ्तों में जलग्रहण क्षेत्रों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो पनबिजली उत्पादन पर दबाव बना रहेगा।
वहीं, ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ इस गिरावट के लिए जलाशयों के रखरखाव में कमी को भी एक बड़ा कारण मानते हैं। उनका कहना है कि भवानीसागर और कुंदाह जैसे कुछ जलाशयों में गाद निकालने (डी-सिल्टिंग) का आखिरी बड़ा अभियान 2010 में चलाया गया था। एक अनुमान के मुताबिक, गाद जमा होने से जलाशयों की पानी जमा करने की प्रभावी क्षमता लगभग 20% तक घट गई है, जिससे मानसून का पानी भी ठीक से संग्रहित नहीं हो पा रहा है।
इनपुट: IANS



