ईरान पर अमेरिकी रणनीति में बड़ा बदलाव: सैन्य कार्रवाई की जगह अब आर्थिक घेराबंदी पर ज़ोर
अमेरिका, ईरान के खिलाफ अपनी रणनीति में एक अहम बदलाव कर रहा है। अब वह पारंपरिक सैन्य विकल्पों के बजाय ईरान पर व्यापक आर्थिक दबाव बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…
अमेरिका, ईरान के खिलाफ अपनी रणनीति में एक अहम बदलाव कर रहा है। अब वह पारंपरिक सैन्य विकल्पों के बजाय ईरान पर व्यापक आर्थिक दबाव बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई नीति का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग करना है, हालांकि इसकी सफलता को लेकर कई सवाल भी उठाए जा रहे हैं।
इस नई रणनीति को 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य ईरान को मिलने वाली हर तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक मदद को रोकना है। यह पहले के 'ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी' से कहीं ज़्यादा आक्रामक है, जो आर्थिक दबाव तो बनाता था, लेकिन उसका दायरा सीमित और कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक ही केंद्रित था।
क्यों बदली गई रणनीति?
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सुरक्षा तंत्र ने यह बदलाव इसलिए किया है क्योंकि पारंपरिक सैन्य ताकत के इस्तेमाल से ईरान को पीछे धकेलने में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा, अमेरिका के अपने सैन्य संसाधनों पर भी भारी दबाव पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी सेना अपने 'थाड' इंटरसेप्टर मिसाइल भंडार का लगभग 80 प्रतिशत और पैट्रियट मिसाइल सिस्टम के करीब आधे संसाधन इस्तेमाल कर चुकी है। लंबी दूरी की मिसाइलों के भंडार में भी कमी आई है, जिसने अमेरिका की वैश्विक तैयारी को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
सफलता पर संदेह
इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित एक लेख का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इस नई रणनीति के सफल होने की संभावना कम है। इसका मुख्य कारण ईरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कट्टरपंथी नेताओं का बढ़ता प्रभाव है। इतिहास बताता है कि कठोर विचारधारा वाले और आंतरिक रूप से मजबूत शासन व्यवस्थाओं पर कड़े प्रतिबंध और आर्थिक दबाव का असर सीमित ही रहा है।
नई नीति के दोहरे फायदे
रणनीति में इस बदलाव से अमेरिका को दो संभावित फायदे हो सकते हैं। पहला, इससे उसके हथियारों और गोला-बारूद के घटते भंडार पर दबाव कम होगा। दूसरा, यह सैन्य दबाव बनाए रखते हुए कूटनीतिक बातचीत की गुंजाइश भी पैदा करता है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि यह आर्थिक घेराबंदी ज़मीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित होती है।
इनपुट: IANS



