शिवसेना (UBT) का केंद्र पर निशाना: 'GDP के अच्छे आंकड़े बेरोज़गारी और रुपये की गिरावट को नहीं छिपा सकते'
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों का जश्न मनाने और आम लोगों के आर्थिक संघर्षों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र…
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों का जश्न मनाने और आम लोगों के आर्थिक संघर्षों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' के एक संपादकीय में कहा है कि आर्थिक आंकड़ों के दावे गिरते भारतीय रुपये और बढ़ती बेरोज़गारी दर जैसी ज़मीनी हकीकतों को छिपा नहीं सकते।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 7.8 प्रतिशत की तिमाही जीडीपी वृद्धि दर पर की गई सोशल मीडिया पोस्ट की आलोचना की। संपादकीय में सरकार के इस रुख को आम नागरिकों के संघर्षों से कटा हुआ और दिखावटी बताया गया है। शिवसेना (यूबीटी) ने सवाल उठाया, "यदि देश अभूतपूर्व प्रगति की ऊंचाइयों को छू रहा है, तो 85 करोड़ नागरिकों को जीवित रहने के लिए मुफ्त अनाज पर क्यों निर्भर रहना पड़ता है?"
महंगाई और आम आदमी पर असर
संपादकीय में भीषण मुद्रास्फीति के कारण घरेलू बजट पर पड़ रहे असर पर प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया है कि 1 सितंबर से त्योहारी मौसम से ठीक पहले कीमतों में व्यापक वृद्धि हुई है। पार्टी के अनुसार, मुंबई में दूध 9-10 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ, गुड़ के दाम 25% बढ़े, और प्याज 50 रुपये किलो के पार पहुंच गया। इसके अलावा, घरेलू पीएनजी, सीएनजी, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से ऑटो-रिक्शा और टैक्सी का किराया भी बढ़ रहा है, जिससे दिहाड़ी मजदूरों पर सीधा असर पड़ा है।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चिंता
पार्टी ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को भी रेखांकित किया। संपादकीय के अनुसार, कृषि विकास दर 4.4 प्रतिशत से घटकर 3.6 प्रतिशत रह गई है। मानसून में एक महीने से जारी सूखे के कारण खरीफ की फसल पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं, जिससे ग्रामीण आजीविका सीधे तौर पर खतरे में है। एक साल में 7,000 से ज्यादा किसानों की आत्महत्या की दुखद घटना देश की आर्थिक स्थिति की एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है।
सरकारी खजाने और बकाया बिल
शिवसेना (यूबीटी) ने दावा किया कि आर्थिक संकट सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य प्रशासन में भी गहराई तक व्याप्त है। महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा गया कि ठेकेदारों का सरकार पर बकाया 90,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जिसके कारण 17 ठेकेदारों को आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या करनी पड़ी। संपादकीय में इस बात पर भी सवाल उठाया गया है कि जब राज्य के खजाने खाली हो रहे हैं, तो प्रधानमंत्री देखभाल कोष में पड़े 10,000 करोड़ रुपये का उपयोग गरीबों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा है।
इनपुट: IANS



