शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा: सिर्फ तस्करी नहीं, शासन की विफलता का प्रतीक है यह 'शैडो इकॉनमी'

ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर दशकों से चली आ रही तस्करी सिर्फ एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी 'शैडो पॉलिटिकल इकॉनमी' (अदृश्य राजनीतिक अर्थव्यवस्था) बन चुकी है। समाचार…

ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा: सिर्फ तस्करी नहीं, शासन की विफलता का प्रतीक है यह 'शैडो इकॉनमी'
(फोटो: IANS)

ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाओं पर दशकों से चली आ रही तस्करी सिर्फ एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी 'शैडो पॉलिटिकल इकॉनमी' (अदृश्य राजनीतिक अर्थव्यवस्था) बन चुकी है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से 'यूरेशिया रिव्यू' की एक रिपोर्ट बताती है कि यह अवैध कारोबार अब सुरक्षा तंत्र, स्थानीय शासन और सीमावर्ती समुदायों की आजीविका में गहराई तक समा चुका है।

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रिपोर्ट के अनुसार, इस अवैध गतिविधि को केवल कमजोर सीमाओं का नतीजा मानना एक भूल होगी। असल में, यह व्यवस्था कुछ सैन्य तत्वों समेत उन प्रभावशाली लोगों के हितों को साधती है, जिन्हें इसके बने रहने से फायदा होता है। रिपोर्ट में कहा गया है, "दशकों से, नीति-निर्माताओं ने ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर होने वाली तस्करी को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश किया है। असल में, यह कहीं अधिक गंभीर मामला है।"

संगठित नेटवर्क और मिलीभगत

यह तस्करी नेटवर्क बलूचिस्तान के रेगिस्तान से लेकर तीनों देशों को जोड़ने वाले दुर्गम रास्तों तक फैला हुआ है। इसके जरिए ईंधन, नशीले पदार्थ, हथियार, लकड़ी, कीमती पत्थर, सोना और संगमरमर जैसे कई सामानों की अवैध आवाजाही होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, हेलमंद प्रांत का 'बहरामचा' और अर्घिस्तान जिले का 'शिन नारी' कॉरिडोर जैसे केंद्र तस्करों को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने वाले प्रमुख लॉजिस्टिक हब बन गए हैं।

ये नेटवर्क अलग-थलग काम नहीं करते, बल्कि बेहद व्यवस्थित हैं और सरकारी दबाव के हिसाब से खुद को ढालने में माहिर हैं। जब अधिकारी किसी एक वस्तु की तस्करी पर सख्ती करते हैं, तो ये नेटवर्क दूसरी वस्तुओं, जैसे कीमती पत्थर या सोने, की तस्करी बढ़ा देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कड़ी निगरानी वाली सीमाओं से भारी मात्रा में सामान की तस्करी सरकारी तंत्र की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। इसमें कहा गया है, "चाहे वह भ्रष्टाचार के जरिए हो, चुनिंदा तरीके से कानून लागू करने से हो, अनौपचारिक वसूली से हो, या राजनीतिक संरक्षण से—सरकारी तंत्र के कुछ हिस्से अक्सर उन्हीं गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं, जिन्हें रोकने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती है।"

आजीविका का साधन और नियंत्रण का जरिया

खासकर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में यह स्थिति स्पष्ट दिखती है, जो लंबे समय से आर्थिक पिछड़ेपन और विद्रोह से जूझ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि ऐसे प्रतिकूल माहौल में अवैध व्यापार कई लोगों के लिए आजीविका का जरिया बन जाता है। इससे राजस्व पैदा होता है और स्थानीय ताकतवर लोग अपना प्रभाव बनाए रखते हैं।

रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र से जुड़े कुछ लोगों के लिए ये नेटवर्क सिर्फ आर्थिक लाभ का स्रोत नहीं हैं, बल्कि इनका इस्तेमाल जनजातीय संबंधों को संभालने और उन इलाकों में स्थिरता बनाए रखने के लिए भी किया जाता है, जहां सरकारी नियंत्रण कमजोर है।

इनपुट: IANS

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