सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता पाकिस्तान के लिए कैसे बना मुसीबत का सबब, एक रिपोर्ट का दावा
पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ किया गया एक अहम रक्षा समझौता अब उसी के लिए मुश्किलें खड़ी करता दिख रहा है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते की वजह से पाकिस्तान पश्चिम एशिया के एक बड़े संघर्ष में खिंच…
पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ किया गया एक अहम रक्षा समझौता अब उसी के लिए मुश्किलें खड़ी करता दिख रहा है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते की वजह से पाकिस्तान पश्चिम एशिया के एक बड़े संघर्ष में खिंच सकता है, जिससे उसकी पहले से मौजूद सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से 'द गार्डियन' की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यमन में सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते तनाव का सीधा दबाव पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर पर पड़ रहा है।
यह समझौता पिछले साल सितंबर में हुआ था, जब जनरल मुनीर की मौजूदगी में रियाद में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ इस पर हस्ताक्षर किए गए थे। समझौते के तहत, पाकिस्तान को सऊदी अरब से अरबों डॉलर का निवेश और कर्ज मिलना था, जिसके बदले में उसे सऊदी सेना को प्रशिक्षित करना और किसी भी हमले की स्थिति में उसकी रक्षा करनी थी।
समझौता और बदलती परिस्थितियां
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने यह अनुमान लगाया था कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंध सुधरेंगे और खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम हो जाएगा। लेकिन स्थिति इसके विपरीत हुई। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बमबारी की आशंका और फिर ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर मिसाइल हमलों की धमकी के बाद हालात तेजी से बदल गए। इस तनाव ने सऊदी अरब और यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच टकराव को फिर से हवा दे दी।
जब हूती विद्रोहियों ने यमन के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया और सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, तो दोनों के बीच हुआ नाजुक शांति समझौता टूट गया। सऊदी अरब ने भी जवाबी कार्रवाई में यमन पर हवाई हमले किए, जिससे एक बड़े संघर्ष का खतरा पैदा हो गया है।
मक्का समझौता और बढ़ता दबाव
इस्लामाबाद पर दबाव तब और बढ़ गया जब अगस्त में इस रक्षा समझौते का विस्तार करते हुए इसमें तुर्की को भी शामिल कर लिया गया और इसका नाम 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' रखा गया। इस नए समझौते के मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक पर भी हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीका के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है, "मुझे नहीं लगता कि आसिम मुनीर ने इस क्षेत्र के सामने मौजूद खतरों का सही आकलन किया था—और यह भी कि पाकिस्तान को इतनी जल्दी अपनी सेना को मोर्चे पर उतारना पड़ सकता है।"
सऊदी अरब के पास अत्याधुनिक सैन्य उपकरण तो हैं, लेकिन हूती विद्रोहियों से सीधे लड़ने का अनुभव कम है। यहीं पर पाकिस्तान की अनुभवी सेना की भूमिका अहम हो जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर सऊदी अरब हूती के खिलाफ 'मक्का समझौते' को लागू करता है, तो पाकिस्तान पर अपनी सेना तैनात करने का भारी दबाव होगा।
आर्थिक निर्भरता और आंतरिक चिंताएं
सऊदी अरब पर पाकिस्तान की आर्थिक निर्भरता भी एक बड़ा कारक है। हाल ही में रियाद ने इस्लामाबाद को 8 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी है। वहीं, पाकिस्तानी अधिकारी इस व्यापक संघर्ष में घसीटे जाने को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि देश की सीमा ईरान से लगती है और वह पहले से ही उग्रवाद और अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर पाकिस्तान हूती के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो इसे ईरान के खिलाफ एक सीधा कदम माना जाएगा, जिससे क्षेत्रीय और आंतरिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। पाकिस्तान की सीनेट में विपक्ष के नेता राजा नासिर अब्बास ने चेतावनी दी, "अगर पाकिस्तान युद्ध में कूदता है तो यह देश के लिए तबाही होगी।" उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पहले से ही "दो खतरनाक विद्रोहों" और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था का सामना कर रहा है।
इनपुट: IANS



