तृणमूल कांग्रेस में चुनाव चिह्न की लड़ाई: बागी गुट आज चुनाव आयोग से मिलेगा
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर विवाद गहरा गया है। पार्टी के निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट आज (गुरुवार को) नई दिल्ली म
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर विवाद गहरा गया है। पार्टी के निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट आज (गुरुवार को) नई दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पूर्ण पीठ से मुलाकात करेगा। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक के दौरान विद्रोही खेमा पार्टी के चुनाव चिह्न (लोगो) और फंड पर अपना दावा पेश करेगा।
ऋतब्रत बनर्जी ने पुष्टि की है कि आयोग ने उनके गुट की दलीलें सुनने के लिए गुरुवार का समय निर्धारित किया है। इसे लेकर 10 विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल बुधवार शाम को ही दिल्ली के लिए रवाना हो गया था। यह मुलाकात पार्टी में आंतरिक सत्ता संघर्ष की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसकी शुरुआत 22 जून को बागी विधायकों द्वारा एक नई राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन के साथ हुई थी।
क्या है बागी गुट का दावा?
विद्रोही गुट का दावा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायकों में से 60 विधायक उनके साथ हैं। उनका तर्क है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति निष्ठावान खेमा अब 'मूल लेकिन अल्पमत' में है, जिनके पास केवल 20 विधायक हैं। इसी बहुमत के आधार पर बागी गुट ने 30 सदस्यीय नई राष्ट्रीय कार्यसमिति और 10 सदस्यीय उप-समिति बनाई थी। इस नई समिति में ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को यह जिम्मेदारी दी गई थी।
कानूनी और संख्यात्मक आधार
इस पूरे विवाद का कानूनी आधार निर्वाचन चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 पर टिका है। इसके तहत, किसी क्षेत्रीय दल को अपना चुनाव चिह्न बनाए रखने के लिए कम से कम छह प्रतिशत वैध मत और न्यूनतम दो विधायकों की आवश्यकता होती है। बागी गुट का गणित कहता है कि यदि प्रति विधायक औसतन 80,000 वोट माने जाएं, तो 60 विधायकों के समर्थन से उनके पक्ष में करीब 48 लाख वोट होते हैं। यह संख्या चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित छह प्रतिशत (लगभग 37.80 लाख वोट) की सीमा से काफी अधिक है।
इसके विपरीत, वे दावा करते हैं कि 20 विधायकों वाले 'मूल' गुट के वोट इस आवश्यक आंकड़े तक नहीं पहुँचते हैं। इसी तर्क के आधार पर विद्रोही खेमा चुनाव चिह्न पर अपना दावा मजबूत मान रहा है। वकीलों की एक टीम पहले ही इससे संबंधित सभी प्रस्ताव और कानूनी दस्तावेज आयोग के समक्ष जमा करा चुकी है।
इनपुट: IANS



