बाज़ार से अतिरिक्त पैसा सोखने के लिए RBI बेचेगा 1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) को कम करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी…
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) को कम करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत 1 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचेगा, जिसका मकसद सिस्टम में बढ़ी हुई नकदी को नियंत्रित करना और ब्याज दरों को अपने नीतिगत स्तर के करीब लाना है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह बॉन्ड बिक्री पिछले दो वर्षों में आरबीआई द्वारा की गई पहली शुद्ध ओपन मार्केट बिक्री होगी। इससे पहले केंद्रीय बैंक ने सितंबर 2024 में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की थी। हाल के दिनों में बैंकिंग प्रणाली में नकदी का प्रवाह काफी बढ़ गया है, जिसकी एक बड़ी वजह आरबीआई की विशेष विदेशी मुद्रा जुटाने की योजना रही, जिसमें उम्मीद से ज़्यादा पैसा आया। इस वजह से देश का विदेशी मुद्रा भंडार तो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, लेकिन साथ ही रुपये की तरलता भी बढ़ गई।
बिक्री की प्रक्रिया और तारीखें
आरबीआई इस बिक्री को तीन चरणों में पूरा करेगा। ये वे बॉन्ड होंगे जो वित्त वर्ष 2028-29 से 2031-32 के बीच परिपक्व (mature) हो रहे हैं। बिक्री का शेड्यूल इस प्रकार है:
- पहला चरण: 17 सितंबर 2026 को 50,000 करोड़ रुपये
- दूसरा चरण: 21 सितंबर 2026 को 25,000 करोड़ रुपये
- तीसरा चरण: 28 सितंबर 2026 को 25,000 करोड़ रुपये
यह नीलामी बहु-प्रतिभूति (मल्टी-सिक्योरिटी) और बहु-मूल्य (मल्टीपल प्राइस) पद्धति से की जाएगी। पात्र प्रतिभागी 17 सितंबर को सुबह 9:30 से 10:30 बजे के बीच आरबीआई के ई-कुबेर सिस्टम पर अपनी बोलियां जमा कर सकते हैं और नतीजे भी उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे।
बाज़ार पर तत्काल असर
आरबीआई की इस घोषणा का असर सरकारी बॉन्ड बाज़ार पर तुरंत देखने को मिला। बॉन्ड बिकवाली की खबर आते ही बॉन्ड यील्ड (प्रतिफल) में तेज उछाल आया और यह तीन महीने से ज़्यादा के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। देश के मानक 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6 आधार अंक बढ़कर 7.035% हो गई, जबकि 5-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड में लगभग 10 आधार अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 6.6222% पर पहुंच गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि अतिरिक्त नकदी के कारण ओवरनाइट ब्याज दरें आरबीआई की रेपो रेट से नीचे चली गई थीं। ऐसे समय में जब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बना रही हैं, तब आरबीआई के लिए नकदी को नियंत्रित करना और ज़रूरी हो जाता है।
इनपुट: IANS



