भारत-चीन द्विपक्षीय वार्ता: व्यापार घाटे और औद्योगिक निर्भरता के बीच संतुलन साधने की चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शनिवार शाम को होने वाली बैठक में व्यापार संतुलन का अहम मुद्दा चर्चा के केंद्र में रहने की उम्मीद है। यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब चीन…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शनिवार शाम को होने वाली बैठक में व्यापार संतुलन का अहम मुद्दा चर्चा के केंद्र में रहने की उम्मीद है। यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब चीन, अमेरिका को पछाड़कर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है, लेकिन इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल 99.21 अरब डॉलर था। यह लगातार बढ़ता घाटा भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है — 2023-24 में 83.2 अरब डॉलर, 2022-23 में 73.3 अरब डॉलर और 2021-22 में यह 44 अरब डॉलर था।
व्यापार घाटे के आंकड़े
आंकड़ों पर गौर करें तो 2025-26 में चीन को भारत का निर्यात 36.62% बढ़कर 19.47 अरब डॉलर तक पहुंचा, जो पिछले वर्ष 14.25 अरब डॉलर था। हालांकि, इसी अवधि में चीन से भारत का आयात 16.03% की वृद्धि के साथ 131.63 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले साल यह 113.46 अरब डॉलर था। कुल मिलाकर, 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार 18.31% बढ़कर 151.10 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
सिर्फ़ उपभोक्ता सामान का मामला नहीं
यह व्यापार असंतुलन सिर्फ़ उपभोक्ता वस्तुओं के कारण नहीं है। भारत द्वारा चीन से आयात की जाने वाली वस्तुओं में एक बड़ा हिस्सा औद्योगिक इनपुट, कलपुर्जों और पूंजीगत वस्तुओं का है, जिनका इस्तेमाल भारतीय निर्माता उत्पादन और रोजगार सृजन के लिए करते हैं। जीटीआरआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का लगभग 43% और मशीनरी व कंप्यूटर आयात का 40% हिस्सा चीन से आता है।
इसके अलावा, भारत अपनी ज़रूरत के छह प्रमुख खनिजों का 40% से अधिक चीन से आयात करता है। यह निर्भरता भारत की नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy), इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं (Defence Supply Chains) में एक बड़ी कमजोरी पैदा करती है। अगर चीन इन जरूरी वस्तुओं का निर्यात रोकता है, तो इन क्षेत्रों में गंभीर बाधाएं आ सकती हैं। वहीं, इस बैठक में चीन की ओर से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह भारत से अपने निवेश नियमों में ढील देने की मांग करे, ताकि चीनी कंपनियां तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार का लाभ उठा सकें।
इनपुट: IANS



