तालिबान से दोस्ती पाकिस्तान को पड़ी भारी? जो कभी मददगार थे, अब बने बड़ी सुरक्षा चुनौती
एक समय था जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी को अपनी एक बड़ी रणनीतिक जीत मान रहा था। लेकिन अब वही तालिबान शासन उसके लिए एक गंभीर और लगातार बढ़ती सुरक्षा चुनौती बन गया है। समाचार…
एक समय था जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी को अपनी एक बड़ी रणनीतिक जीत मान रहा था। लेकिन अब वही तालिबान शासन उसके लिए एक गंभीर और लगातार बढ़ती सुरक्षा चुनौती बन गया है। समाचार एजेंसी IANS ने कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि दोनों देशों के बीच तनाव इस कदर बढ़ गया है कि यह सीधे सैन्य टकराव तक पहुँच चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह आकलन कि काबुल में तालिबान के आने से पाकिस्तान के हित सधेंगे, पूरी तरह गलत साबित हुआ है। तालिबान सरकार अपनी राजनीतिक सत्ता और सुरक्षा से जुड़ी प्राथमिकताओं को पाकिस्तान के अधीन रखने के लिए तैयार नहीं है। इसका नतीजा यह है कि पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से दोनों देशों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी हुई है।
क्यों बिगड़े पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते?
दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) द्वारा किए जा रहे हमले हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के आतंकी अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं। जवाब में पाकिस्तान ने न सिर्फ अफगान सीमा के भीतर हवाई हमले किए, बल्कि बिना दस्तावेज़ों के रह रहे अफगान शरणार्थियों को भी देश से निकालना शुरू कर दिया, जिससे तनाव और गहरा गया।
रिपोर्ट में अनाया कय्यूम लिखती हैं कि अमेरिका की मौजूदगी के दौरान पाकिस्तान ने तालिबान को सुरक्षित पनाहगाह और खुफिया मदद मुहैया कराई थी। अब पाकिस्तान चाहता है कि अफगान तालिबान TTP के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। हालांकि, दोनों संगठनों के बीच वैचारिक समानता, सदस्यों के आपसी रिश्ते और सीमा पार पश्तून पहचान जैसे कारक इस मामले को बेहद जटिल बना देते हैं।
दावों और हकीकत का टकराव
दोनों देशों के बीच विरोधाभासी दावे अब आम हो गए हैं। इसका एक उदाहरण जून में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में किए गए हवाई हमले हैं। पाकिस्तान ने इन हमलों को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताते हुए 26 आतंकवादियों को मारने का दावा किया था। वहीं, तालिबान ने इसे नागरिकों पर हमला बताते हुए 13 लोगों की मौत और 14 के घायल होने की बात कही थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान खुद को एक स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्रवादी संगठन के तौर पर पेश करता है, जिसने देश को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराया। ऐसे में पाकिस्तान का प्रभाव स्वीकार करना उसकी अपनी राजनीतिक छवि के खिलाफ जाएगा। नतीजा यह है कि पाकिस्तान आज उसी शासन के साथ एक सक्रिय संघर्ष में उलझ गया है, जिसे वह कभी अपना रणनीतिक सहयोगी मानता था।
इनपुट: IANS



