रविवार, 12 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
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लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरी बड़ी सफलता, भारत की पहली भू-तापीय बिजली परियोजना का रास्ता साफ

धरती के गर्भ में छिपी ऊर्जा से बिजली बनाने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना में एक और अहम पड़ाव पार हो गया है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) ने लद्दाख की पुगा घाटी में अपन

लद्दाख की पुगा घाटी में दूसरी बड़ी सफलता, भारत की पहली भू-तापीय बिजली परियोजना का रास्ता साफ
(फोटो: IANS)

धरती के गर्भ में छिपी ऊर्जा से बिजली बनाने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना में एक और अहम पड़ाव पार हो गया है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) ने लद्दाख की पुगा घाटी में अपने दूसरे भू-तापीय कुएं की ड्रिलिंग सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह उपलब्धि देश के पहले पायलट भू-तापीय बिजली संयंत्र की स्थापना की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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यह ड्रिलिंग ओएनजीसी की अनुसंधान एवं विकास इकाई, ओएनजीसी एनर्जी सेंटर द्वारा की गई। टीम ने समुद्र तल से 14,000 फीट से भी ज़्यादा की ऊंचाई पर करीब एक महीने में 1,000 मीटर गहरे कुएं की खुदाई पूरी की। ओएनजीसी के बयान में बताया गया है कि यह काम न सिर्फ पिछले कुएं की तुलना में कम समय में हुआ, बल्कि इसकी लागत भी कम आई।

सफलता पर बनी आगे की राह

इस दूसरे कुएं की सफलता, पहले कुएं के शानदार नतीजों पर आधारित है। पहले कुएं से पानी के उबलने के तापमान से भी ज़्यादा गर्म भाप निकली थी, जिससे इस क्षेत्र में भू-तापीय ऊर्जा की अपार संभावनाओं की पुष्टि हुई थी। अब इस दूसरे कुएं से मिले नतीजों से 1 मेगावाट (MWe) क्षमता का पायलट भू-तापीय बिजली संयंत्र विकसित करने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी लद्दाख स्थित पुगा, भारत का सबसे संभावनाशील भू-तापीय क्षेत्र है। हालांकि, यहां लंबे समय से खोज कार्य होते रहे हैं, लेकिन तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों के कारण अब तक व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन नहीं हो सका था।

क्या है भू-तापीय ऊर्जा?

भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) पृथ्वी की सतह के नीचे मौजूद प्राकृतिक गर्मी का उपयोग करती है। इससे बिजली बनाने के साथ-साथ सीधे ताप भी उपलब्ध कराया जा सकता है। यह ऊर्जा का एक कम कार्बन उत्सर्जन वाला स्रोत है जो चौबीसों घंटे उपलब्ध रहता है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, यह मौसम पर बहुत कम निर्भर होती है, इसलिए इसे ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है। इस परियोजना का अगला चरण 1 मेगावाट का पायलट प्लांट स्थापित करना और लंबे समय में लद्दाख को एक स्थायी और विश्वसनीय बिजली स्रोत प्रदान करना है।

यह प्रयास भारत के 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है। देश में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता 2014 के 81 गीगावाट से 256% बढ़कर अब 288 गीगावाट हो गई है। इसी अवधि में सौर ऊर्जा 2.8 गीगावाट से 155 गीगावाट और पवन ऊर्जा 21 गीगावाट से 56.4 गीगावाट तक पहुंच गई है।

इनपुट: IANS

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