बंगाल की नई औद्योगिक नीति: ज़मीन अधिग्रहण की बाधा दूर करने के लिए भू-मालिकों को हिस्सेदार बनाने की तैयारी
पश्चिम बंगाल सरकार उद्योगों के लिए ज़मीन अधिग्रहण की पुरानी और सबसे बड़ी चुनौती से निपटने के लिए एक नई राह तलाश रही है। सितंबर के मध्य तक आने वाली राज्य की नई औद्योगिक नीति में एक ऐसा प्रावधान शामिल…
पश्चिम बंगाल सरकार उद्योगों के लिए ज़मीन अधिग्रहण की पुरानी और सबसे बड़ी चुनौती से निपटने के लिए एक नई राह तलाश रही है। सितंबर के मध्य तक आने वाली राज्य की नई औद्योगिक नीति में एक ऐसा प्रावधान शामिल किया जा सकता है, जिसके तहत ज़मीन देने वाले भू-मालिकों को संबंधित औद्योगिक इकाइयों में हिस्सेदार बनाया जाएगा। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस पहल का मकसद सिंगुर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों की पुनरावृत्ति को रोकना है, जिसने पिछली वाम मोर्चा सरकार के दौरान औद्योगिक विकास में बड़ी बाधा डाली थी।
नीति निर्माण से जुड़े राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ज़मीन मालिकों को औद्योगिक इकाइयों से जोड़ने के लिए दो मुख्य विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला विकल्प यह है कि ज़मीन देने वाले परिवार के किसी एक सदस्य को प्रस्तावित फैक्ट्री या इकाई में नौकरी दी जाए। दूसरा विकल्प उन्हें ऐसे छोटे उद्यम शुरू करने में मदद करना है, जो मुख्य औद्योगिक इकाई की ज़रूरतों को पूरा कर सकें।
कैसे काम करेगा हिस्सेदारी का मॉडल?
अधिकारी के अनुसार, हर बड़ी औद्योगिक इकाई में सहायक उद्योगों (Ancillary Industries) की ज़रूरत होती है। ये दो तरह के हो सकते हैं - 'प्रत्यक्ष' और 'अप्रत्यक्ष'। प्रत्यक्ष सहायक इकाइयाँ मुख्य फैक्ट्री को तकनीकी उपकरण सप्लाई करती हैं, जिनमें विशेष विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, इसलिए यहाँ ज़मीन मालिकों की सीधी भागीदारी मुश्किल है।
हालांकि, 'अप्रत्यक्ष सहयोग' वाले उद्यमों में काफ़ी संभावनाएं हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया, "ज़मीन-मालिकों की सहकारी समिति द्वारा चलाई जाने वाली सिलाई यूनिट, जो फैक्ट्री कर्मचारियों के लिए वर्दी बनाती है, या इसी तरह की सहकारी कैंटीन जो स्टाफ़ के लिए खाना सप्लाई करती है, ऐसे 'अप्रत्यक्ष सहयोग' वाले उद्यमों के बेहतरीन उदाहरण हो सकते हैं।"
किन उद्योगों पर रहेगा सरकार का ज़ोर?
राज्य के वाणिज्य और उद्योग मंत्री तापस रॉय पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि नई नीति में उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी, जहाँ सहायक उद्योगों की मांग ज़्यादा है। इन क्षेत्रों में टेक्सटाइल और गारमेंट्स, लोहा-इस्पात, भारी बिजली उपकरण, ऑटोमोटिव और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) एवं इलेक्ट्रॉनिक्स प्रमुख हैं। इसके अलावा, उत्तरी बंगाल के लिए 'ट्रिपल-टी' यानी चाय, लकड़ी और पर्यटन (Tea, Timber, and Tourism) पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
इनपुट: IANS



