महाराष्ट्र: आर्थिक संकट से जूझ रही चीनी मिलों को सरकार देगी ₹2,000 करोड़ का आसान कर्ज
महाराष्ट्र की आर्थिक संकट से जूझ रही सहकारी चीनी मिलों को जल्द ही एक बड़ा सहारा मिलने वाला है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, राज्य सरकार ने मिलों को वित्तीय स्थिरता देने और गन्ना किसानों का बकाया…
महाराष्ट्र की आर्थिक संकट से जूझ रही सहकारी चीनी मिलों को जल्द ही एक बड़ा सहारा मिलने वाला है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, राज्य सरकार ने मिलों को वित्तीय स्थिरता देने और गन्ना किसानों का बकाया चुकाने में मदद करने के लिए ₹2,000 करोड़ की एक आसान ऋण योजना लाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत मिलों को कम ब्याज पर कर्ज मुहैया कराया जाएगा, जिसका बड़ा हिस्सा सरकार खुद वहन करेगी।
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने अधिकारियों को इस संबंध में एक औपचारिक प्रस्ताव तुरंत कैबिनेट के सामने पेश करने का निर्देश दिया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गन्ना किसानों को उनकी फसल का भुगतान समय पर मिल सके। गौरतलब है कि राज्य की चीनी मिलों पर पिछले पेराई सीजन का किसानों का करीब ₹200 करोड़ का बकाया है, जिसके भुगतान में यह फंड महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
कर्ज योजना की रूपरेखा
प्रस्तावित योजना के तहत, पात्र सहकारी चीनी मिलों को डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (डीसीसीबी) और महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक (एमएससीबी) के माध्यम से ऋण दिया जाएगा। यह ऋण मिल की गन्ना पेराई क्षमता और उसकी आर्थिक स्थिति के मूल्यांकन के बाद मंजूर होगा। मिलों को इस कर्ज को चुकाने के लिए 7 साल का समय मिलेगा। सरकार ने सालाना लगभग ₹100 करोड़ के ब्याज का बोझ खुद उठाने का फैसला किया है, जिससे यह कर्ज मिलों के लिए काफी सस्ता हो जाएगा।
अब चीनी के अलावा दूसरे उत्पादों पर भी जोर
सिर्फ कर्ज ही नहीं, सरकार चीनी उद्योग की आय के स्रोत बढ़ाने पर भी काम कर रही है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने चीनी के उप-उत्पादों (बाय-प्रोडक्ट्स) पर केंद्रित एक स्वतंत्र और व्यापक नीति बनाने के भी निर्देश दिए हैं। उन्होंने एक उच्चस्तरीय बैठक में कहा कि इस कदम से उद्योग की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती बढ़ेगी और किसानों को भी कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलेगी।
इस नई नीति का उद्देश्य चीनी मिलों को सौर ऊर्जा, को-जनरेशन बिजली, एथेनॉल, कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG), ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) जैसे क्षेत्रों में उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे मिलों की निर्भरता सिर्फ कच्ची चीनी के उत्पादन पर कम होगी और वे आधुनिक बायोरिफाइनरी के रूप में विकसित हो सकेंगी।
उद्योग की मौजूदा चुनौतियाँ
चीनी मिलों के सूत्रों ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। वर्तमान में, केंद्र सरकार के फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) नियम के तहत मिलों को गन्ना खरीदने के 14 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान करना अनिवार्य है। लेकिन चीनी की बिक्री से होने वाली आय और भुगतान की इस बाध्यता में संतुलन न बन पाने के कारण मिलों को अक्सर नकदी की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे किसानों का बकाया बढ़ता जाता है। नई कर्ज योजना से इस समस्या को हल करने में काफी मदद मिलेगी।
इनपुट: IANS



