MP हाई कोर्ट का अहम फैसला: सिर्फ 'फतवे' के आधार पर तलाक की घोषणा नहीं हो सकती
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी धार्मिक संस्था या मदरसे से जारी फतवे को तलाक का कानूनी आधार नहीं माना जा सकता। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक…
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी धार्मिक संस्था या मदरसे से जारी फतवे को तलाक का कानूनी आधार नहीं माना जा सकता। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि फतवा केवल इस्लामी धर्मग्रंथों के अनुसार एक राय या मार्गदर्शन होता है और इसके जारी होने से शादी अपने आप खत्म नहीं हो जाती।
यह फैसला जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने एक महिला द्वारा दायर सिविल रिविजन याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। महिला ने अपने पति द्वारा फैमिली कोर्ट में दायर एक मुकदमे को चुनौती दी थी, जिसमें पति ने भोपाल की दारुल-इफ्ता मस्जिद कमेटी से मिले फतवे के आधार पर अपने तलाक की घोषणा करने की मांग की थी।
क्या था पूरा मामला?
एक व्यक्ति ने 29 अक्टूबर, 2024 को जारी एक फतवे को आधार बनाकर फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की और अपनी शादी को समाप्त घोषित करने की गुहार लगाई। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि किसी भी मदरसे या धार्मिक संस्था को तलाक देने का अधिकार नहीं है। पत्नी ने यह भी कहा कि उक्त फतवे में केवल उन परिस्थितियों का जिक्र है जिनमें इस्लामी कानून के तहत तलाक मांगा जा सकता है, यह खुद में तलाक नहीं है।
अदालत का स्पष्ट नजरिया
हाई कोर्ट ने पत्नी के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि फतवा देखने पर यह साफ होता है कि इसमें कहीं भी तलाक देने का जिक्र नहीं है। जस्टिस जैन ने अपने आदेश में कहा, "असल में कोई भी धार्मिक संस्थान किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक का अधिकार नहीं दे सकता।" अदालत ने यह भी कहा कि विचाराधीन फतवे में केवल इस्लामी धर्मग्रंथों के उन प्रावधानों का उल्लेख है जो पत्नी के क्रूर व्यवहार की स्थिति में मार्गदर्शन देते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति कानूनी प्रक्रिया के तहत फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन सिर्फ एक फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा नहीं करवाई जा सकती। अदालत ने यह भी पाया कि पति ने शायद यह मुकदमा इस गलतफहमी में दायर किया था कि वह नियमित तलाक याचिका नहीं दायर कर सकता। इसी आधार पर, हाई कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पति के मुकदमे को खारिज कर दिया।
इनपुट: IANS



