कर्नाटक में सूखे का संकट गहराया, डिप्टी सीएम ने पीएम मोदी से मांगी तत्काल मदद और नियमों में राहत
कमजोर मानसून के कारण कर्नाटक में सूखे की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है, जिससे राज्य की कृषि, पेयजल व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस विकट स्थिति से निपटने के लिए राज्य
कमजोर मानसून के कारण कर्नाटक में सूखे की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है, जिससे राज्य की कृषि, पेयजल व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस विकट स्थिति से निपटने के लिए राज्य के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तत्काल केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग की है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस पत्र में न केवल अतिरिक्त आर्थिक सहायता का अनुरोध किया गया है, बल्कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) के मौजूदा नियमों में राहत देने की भी अपील की गई है।
पत्र में बताया गया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान कर्नाटक में सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है। जून महीने में 42% और जुलाई में अब तक 34% बारिश की कमी दर्ज की गई है। कल्याण कर्नाटक क्षेत्र में भी 36% कम वर्षा हुई है, जबकि राजधानी बेंगलुरु में यह आंकड़ा 34% है। उपमुख्यमंत्री ने इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से एल नीनो के प्रभाव को जिम्मेदार ठहराया है।
कई जिलों में बारिश की भारी कमी
राज्य के कई जिले बारिश की भारी कमी से जूझ रहे हैं, जिससे संकट और बढ़ गया है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में विजयनगर (61%), मैसूर (55%), मडिकेरी (51%), चिक्कमगलुरु (48%), दावणगेरे (47%), हावेरी (46%), शिवमोग्गा (44%), कलबुर्गी (43%), मंगलुरु (43%) और बीदर (40%) शामिल हैं। कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण प्रभावित इलाकों में प्रारंभिक आकलन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत बोई गई फसल बर्बाद हो चुकी है। इसके अलावा, कई जिलों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे सिंचाई और पेयजल का संकट गहरा गया है।
नियमों में बदलाव और किसानों के लिए राहत की मांग
जी. परमेश्वर ने केंद्र से कई महत्वपूर्ण नियमों में बदलाव की मांग की है ताकि किसानों को समय पर और उचित सहायता मिल सके। उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
- किसानों की पहचान: छोटे और सीमांत किसानों की पहचान के लिए 2015-16 की कृषि जनगणना के बजाय राज्य के एफआरयूआईटीएस (किसान पंजीकरण और एकीकृत लाभार्थी सूचना प्रणाली) डेटाबेस को स्वीकार किया जाए।
- नुकसान का आकलन: सूखा मैनुअल-2020 के प्रावधानों को SDRF और NDRF के मानकों के अनुरूप बनाया जाए। वर्तमान में 33% से अधिक फसल नुकसान पर सहायता मिलती है, जबकि सूखा मैनुअल 50% नुकसान को गंभीर सूखे की श्रेणी में रखता है।
- सूखे की घोषणा: सूखे का आकलन करने में अधिक लचीलापन अपनाते हुए वैज्ञानिक आधार पर कम अवधि के सूखे को भी मान्यता दी जाए और सूखे की जल्द घोषणा से जुड़े नियमों में बदलाव हो।
उपमुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि राज्य द्वारा सूखे का आधिकारिक ज्ञापन भेजने से पहले ही मौजूदा सूखा आकलन नियमों की समीक्षा की जाए। उन्होंने अपील की कि इस स्थिति को 'राष्ट्रीय महत्व की आपदा' घोषित करने या उसी स्तर की सहायता प्रदान करने पर विचार किया जाए। पत्र के अनुसार, केंद्र का समय पर हस्तक्षेप लाखों किसानों, पेयजल संकट और सार्वजनिक जल आपूर्ति पर निर्भर करोड़ों लोगों को राहत देने में महत्वपूर्ण साबित होगा।
इनपुट: IANS



