कर्नाटक में जल संकट का खतरा: बारिश के लिए सरकार ने शुरू किया 28.52 करोड़ का क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम
कर्नाटक में इस साल सामान्य से कम बारिश होने के कारण सूखे जैसी स्थिति पैदा हो रही है, जिससे निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वाकांक्षी क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम शुरू किया है। समाचार एजेंसी IANS की…
कर्नाटक में इस साल सामान्य से कम बारिश होने के कारण सूखे जैसी स्थिति पैदा हो रही है, जिससे निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक महत्वाकांक्षी क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम शुरू किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य कृत्रिम वर्षा कराकर पानी की कमी को दूर करना और किसानों के हितों की रक्षा करना है। शुक्रवार को बेंगलुरु के एचएएल हवाई अड्डे पर एक विशेष विमान को हरी झंडी दिखाकर इस अभियान का औपचारिक शुभारंभ किया गया।
जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरयास्वामी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि अगर मानसून के अंत तक पर्याप्त पानी जमा नहीं हुआ तो अगले साल जून तक गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “फिलहाल, सूखे की गंभीरता का सटीक आकलन करना मुश्किल है।” मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के लिए लोगों का हित सर्वोपरि है और इस परियोजना पर आने वाले वित्तीय बोझ की चिंता नहीं की जाएगी।
परियोजना की लागत और कार्यान्वयन
इस क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम को प्रशासनिक मंजूरी मिल चुकी है और इसकी अनुमानित लागत 28.52 करोड़ रुपये (जीएसटी अतिरिक्त) है। इस परियोजना का क्रियान्वयन संयुक्त रूप से जल संसाधन विभाग के तहत कर्नाटक नीरवारी निगम लिमिटेड (केएनएल) और राजस्व विभाग के तहत कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र (केएसडीएमसी) द्वारा किया जा रहा है।
सरकार ने इस कार्यक्रम के वैज्ञानिक और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दो अलग-अलग समितियों का गठन भी किया है। इनमें एक निगरानी समिति और दूसरी तकनीकी सलाहकार समिति शामिल है, जो हर दो घंटे में ऑपरेशन और उसके प्रभाव की जानकारी प्राप्त करेगी।
कैसे काम करेगा क्लाउड सीडिंग?
इस प्रक्रिया में वर्षा को बढ़ावा देने के लिए बादलों में सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रसायन डाले जाते हैं। तकनीकी टीम डॉप्लर रडार की मदद से बादल के घनत्व और हवा की गति जैसे मौसम संबंधी मापदंडों पर लगातार नज़र रखेगी।
क्लाउड सीडिंग के लिए पहले से कोई जिला तय नहीं किया गया है। विमानों की तैनाती वास्तविक समय के मौसम डेटा के आधार पर की जाएगी। प्राथमिकता उन क्षेत्रों को दी जाएगी जहां वर्षा की कमी है, प्रमुख जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्र हैं या किसान कृषि संकट से जूझ रहे हैं।
इनपुट: IANS



