संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर राष्ट्रीय संप्रभुता की वकालत की
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक अहम रुख अपनाते हुए कहा है कि हर देश को अपनी प्राथमिकताओं और लक्ष्यों के अनुरूप AI सिस्टम विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। विदेश…
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक अहम रुख अपनाते हुए कहा है कि हर देश को अपनी प्राथमिकताओं और लक्ष्यों के अनुरूप AI सिस्टम विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में बदलते वैश्विक क्रम में देशों की व्यापक भूमिका का आह्वान करते हुए यह बात कही।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, जयशंकर ने जोर देकर कहा, "हम प्रत्येक राष्ट्र के अपने पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देने के अधिकार में विश्वास करते हैं।" उन्होंने यह टिप्पणी विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल के विकास और उनके राष्ट्रीय उपयोग के संदर्भ में की। उनका यह कथन दर्शाता है कि भारत मानता है कि AI को लेकर कोई एक सार्वभौमिक मार्ग अपनाने के बजाय, देशों को अपने मॉडल और तैनाती के तरीके तय करने में सक्षम होना चाहिए।
AI: संभावनाएं और चुनौतियां
विदेश मंत्री ने AI को एक शक्तिशाली उपकरण बताया जो लोगों को सशक्त बना सकता है, आर्थिक विकास को गति दे सकता है और बड़े पैमाने पर समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने फरवरी में 'एआई इम्पैक्ट समिट' की मेजबानी की थी और ग्लोबल साउथ के साथ अपनी साझेदारी में इस तकनीक को शामिल करने का इरादा रखता है।
हालांकि, उन्होंने AI के दुरुपयोग के खतरों से भी आगाह किया। जयशंकर ने चेतावनी दी कि इसके गलत इस्तेमाल से पूर्वाग्रह बढ़ सकता है और आपसी सम्मान कम हो सकता है। उन्होंने कहा, "जिस तकनीक ने आशा का वादा किया था, वही अब चिंता का स्रोत भी बन गई है।"
बदलता वैश्विक परिदृश्य
जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया अब एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और 1945 के बाद की व्यवस्था नई वास्तविकताओं के सामने कमजोर पड़ रही है। उन्होंने कहा कि आर्थिक शक्ति में बदलाव हो रहा है और राजनीतिक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, इसलिए अब सांस्कृतिक परिवर्तन भी होना चाहिए।
उन्होंने सभी देशों से एक-दूसरे की संस्कृतियों, विरासत और परंपराओं को अधिक महत्व देने का आग्रह किया। विदेश मंत्री ने कहा कि स्थायी शांति के लिए सभ्य चर्चा, व्यापक परामर्श और पारदर्शी निर्णय आवश्यक हैं, और इस प्रक्रिया से मानवता के एक बड़े हिस्से को बाहर नहीं रखा जा सकता।
इनपुट: IANS



