मंगलवार, 4 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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भारत का 'GI' मिशन: 2030 तक 10,000 उत्पादों को मिलेगी वैश्विक पहचान, कारीगरों की बढ़ेगी आय

भारत अपनी अनूठी क्षेत्रीय विरासत और पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का लक्ष्य 2030…

भारत का 'GI' मिशन: 2030 तक 10,000 उत्पादों को मिलेगी वैश्विक पहचान, कारीगरों की बढ़ेगी आय
(फोटो: IANS)

भारत अपनी अनूठी क्षेत्रीय विरासत और पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का लक्ष्य 2030 तक 10,000 उत्पादों को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग दिलाना है, जिससे देश की विरासत-आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और निर्यात के नए अवसर खुलेंगे।

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GI टैग किसी भी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति और खास गुणवत्ता की गारंटी देता है। यह टैग कारीगरों, बुनकरों और किसानों को उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार और कीमत दिलाने में मदद करता है। साथ ही, यह ग्राहकों को भी उत्पाद की प्रामाणिकता का भरोसा देता है। मंगलवार को जारी एक आधिकारिक फैक्टशीट में बताया गया कि ये टैग परंपरा और अवसरों के बीच एक महत्वपूर्ण पुल का काम कर रहे हैं।

GI इकोसिस्टम का विस्तार और सरकारी प्रयास

पिछले कुछ वर्षों में भारत के GI इकोसिस्टम में काफी तेज़ी आई है। देश में अब तक 800 से ज़्यादा उत्पादों को GI टैग मिल चुका है, जिनमें से 607 टैग 2014 के बाद ही दिए गए हैं। इसका असर अधिकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या पर भी साफ दिखता है, जो पिछले 10 सालों में 365 से बढ़कर 29,000 (जनवरी 2025 तक) हो गई है।

सरकार ने इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। 2025 के संशोधन के ज़रिए GI आवेदन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं की फीस में 80% की बड़ी कटौती की गई है। इतना ही नहीं, टैग के नवीनीकरण (रिन्यूअल) की फीस भी 3,000 रुपये से घटाकर महज़ 500 रुपये कर दी गई है।

मुक्त व्यापार समझौते और वैश्विक बाज़ार

सरकार की रणनीति सिर्फ GI टैग देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंचाना भी है। इसके लिए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का सहारा लिया जा रहा है। सरकारी बयान के अनुसार, FTA व्यापारिक बाधाओं को कम करते हैं, जिससे भारतीय GI उत्पादों के लिए निर्यात के मौके बेहतर होते हैं। यही वजह है कि अब GI टैग भारत की व्यापारिक वार्ताओं का एक अहम हिस्सा बन गए हैं।

कारीगरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

GI टैग सिर्फ एक सर्टिफिकेशन नहीं, बल्कि कारीगरों के लिए आमदनी बढ़ाने का एक ज़रिया है। कपड़ा मंत्रालय के अनुसार, इससे ग्रामीण कारीगरों की आय में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह टैग कलाकृतियों की नकल और अनाधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल से बचाता है।

उदाहरण के लिए, कर्नाटक के चन्नापटना खिलौनों को 2006 में GI टैग मिला था। यह टैग सुनिश्चित करता है कि केवल उसी क्षेत्र में बनी विशेष 'लैकरवेयर' कला वाले लकड़ी के खिलौनों को ही यह पहचान मिले। इससे न केवल कारीगरों की कला सुरक्षित रहती है, बल्कि उनकी मोल-भाव करने की क्षमता भी बढ़ती है, जिससे उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिलता है।

इनपुट: IANS

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