बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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सुभाष चंद्रा के 99.97% कर्जमाफी मामले में NCLT के फैसले को चुनौती देगा HDFC बैंक

एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े एक बड़े दिवाला मामले में HDFC बैंक, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के फैसले के खिलाफ अपील करने पर विचार कर रहा है। NCLT ने चंद्रा के लिए एक ऐसी…

सुभाष चंद्रा के 99.97% कर्जमाफी मामले में NCLT के फैसले को चुनौती देगा HDFC बैंक
(फोटो: IANS)

एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े एक बड़े दिवाला मामले में HDFC बैंक, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के फैसले के खिलाफ अपील करने पर विचार कर रहा है। NCLT ने चंद्रा के लिए एक ऐसी पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत कर्जदाताओं को अपने बकाये का 99.97% हिस्सा छोड़ना होगा। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक इस फैसले को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में चुनौती दे सकता है।

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यह पूरा मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया से जुड़ा है। NCLT द्वारा स्वीकृत योजना के अनुसार, चंद्रा को लेनदारों के कुल 22,006.57 करोड़ रुपए के स्वीकृत दावों के बदले सिर्फ 6.25 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। इसके अतिरिक्त, प्रक्रिया लागत के लिए 25 लाख रुपए रखे गए हैं। यानी कुल 6.5 करोड़ रुपए के भुगतान से 22,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज निपटाया जा रहा है, जो कर्जदाताओं के लिए एक बहुत बड़ी कटौती (Haircut) है।

HDFC बैंक की क्या है भूमिका?

इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए HDFC बैंक के एक प्रवक्ता ने बताया कि कुल स्वीकृत दावों में बैंक की हिस्सेदारी सिर्फ 3.2 प्रतिशत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कर्ज मूल रूप से HDFC लिमिटेड द्वारा दिया गया था, जो विलय के बाद बैंक की संपत्ति में शामिल हुआ। बैंक ने यह भी कहा है कि इस लोन के लिए जरूरी प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं। प्रवक्ता के अनुसार, "NCLT मामले में HDFC बैंक का स्वीकृत दावा कुल राशि का केवल 3.2 प्रतिशत था। ... बैंक इस आदेश के खिलाफ NCLAT में अपील दायर करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।"

कई कर्जदाताओं ने किया था विरोध

इस पुनर्भुगतान योजना का कई अन्य लेनदारों ने भी कड़ा विरोध किया था। इनमें LIC हाउसिंग फाइनेंस प्रमुख था, जिसका 1,322.39 करोड़ रुपए का स्वीकृत दावा था। NCLT के आदेश में दर्ज दलील के मुताबिक, उसे इस योजना के तहत सिर्फ 38.09 लाख रुपए मिलने थे, जो उसके कुल बकाये का महज 0.028 प्रतिशत है। LIC हाउसिंग फाइनेंस ने तर्क दिया था कि इतनी मामूली वसूली वाली योजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि यह "अव्यावहारिक और कानून के विपरीत" है।

कैसे मिली योजना को मंजूरी?

शुरुआत में NCLT की दो-सदस्यीय पीठ इस मामले पर एकमत नहीं थी, जिसके बाद न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने तीसरे सदस्य के रूप में नीलेश शर्मा को नियुक्त किया था। न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने ही दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 114 के तहत इस योजना को मंजूरी दी। उन्होंने उन लेनदारों की आपत्तियों को खारिज कर दिया, जिनका कहना था कि वसूली की राशि बहुत कम है और योजना व्यवहार्य नहीं है।

इनपुट: IANS

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