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गुजरात: हल्दी की पारंपरिक खेती को किसान ने बदला मुनाफे के सौदे में, सालाना कमा रहे 11 लाख रुपये

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक किसान ने पारंपरिक खेती से एक कदम आगे बढ़कर मिसाल कायम की है। 70 वर्षीय कालूभाई पटेल ने सिर्फ हल्दी उगाने के बजाय उसे प्रोसेस करके पाउडर और अचार जैसे उत्पादों में बदला…

गुजरात: हल्दी की पारंपरिक खेती को किसान ने बदला मुनाफे के सौदे में, सालाना कमा रहे 11 लाख रुपये
(फोटो: IANS)

गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक किसान ने पारंपरिक खेती से एक कदम आगे बढ़कर मिसाल कायम की है। 70 वर्षीय कालूभाई पटेल ने सिर्फ हल्दी उगाने के बजाय उसे प्रोसेस करके पाउडर और अचार जैसे उत्पादों में बदला और अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा लिया। इस अनूठे तरीके से वे चार एकड़ जमीन से ही सालाना 10 से 11 लाख रुपये तक कमा रहे हैं।

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समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, वधवान तालुका के वडोद गांव के रहने वाले कालूभाई पटेल के पास कुल 10 एकड़ जमीन है। पिछले 13-14 सालों से वे इसमें से चार एकड़ पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें कागवड में एक कृषि मेले से मिली, जहां उन्होंने एक किसान को प्राकृतिक तरीके से हल्दी उगाते देखा था।

प्रसंस्करण से बढ़ाया मुनाफा

कालूभाई ने सिर्फ फसल उगाने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि उसके मूल्यवर्धन (value addition) पर भी काम किया। उन्होंने लगभग 5 लाख रुपये के निवेश से घर पर ही एक प्रसंस्करण इकाई लगाई, जिसमें स्टीम बॉयलर, पॉलिशिंग मशीन और पल्वराइजर शामिल हैं। इस पहल के लिए उन्हें बागवानी विभाग से 2.5 लाख रुपये की सहायता भी मिली।

बाजार में जहां कच्ची हल्दी करीब 150 रुपये प्रति किलो बिकती है, वहीं पटेल अपने 'शक्ति ऑर्गेनिक' ब्रांड के तहत हल्दी पाउडर 350 रुपये प्रति किलो और हरी हल्दी का अचार 440 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचते हैं।

गुणवत्ता और प्राकृतिक खेती पर जोर

पटेल का दावा है कि वे हल्दी को पानी में उबालने की जगह भाप में पकाते हैं, जिससे उसके औषधीय गुण बरकरार रहते हैं। इसके बाद हल्दी को करीब एक महीने तक सुखाया जाता है और फिर साफ करके पाउडर बनाया जाता है। वे हल्दी का माउथ फ्रेशनर भी तैयार करते हैं। उनके जीओपीसीए प्रमाणित जैविक उत्पादों की बिक्री किसी विज्ञापन से नहीं, बल्कि ग्राहकों के बीच आपसी चर्चा (word-of-mouth) से होती है।

हल्दी की खेती के अलावा, पटेल फसल विविधीकरण को भी अपनाते हैं। आठ महीने की हल्दी की फसल के बाद वे खेत में मूंग, तिल और बाजरा जैसी कम समय में तैयार होने वाली फसलें उगाते हैं। अपनी बाकी छह एकड़ जमीन पर वे कपास के साथ अरहर की सह-फसल करते हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है और यूरिया की जरूरत कम हो जाती है।

इनपुट: IANS

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News4Social गुजरात डेस्क

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