सोमवार, 29 जून 2026 · नई दिल्ली
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होर्मुज संकट में भारत की ऊर्जा कूटनीति: जब तेल 126 डॉलर/बैरल पहुँचा, तब भी आम लोगों को नहीं झेलनी पड़ी मार

जब इस साल 28 फरवरी को होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हड़कंप मच गया, तो भारत ने उस दबाव में भी अपनी ईंधन आपूर्ति को लगभग सामान्य बनाए रखा। यूएई में भारत के पूर्व राजदूत नवदीप सू

होर्मुज संकट में भारत की ऊर्जा कूटनीति: जब तेल 126 डॉलर/बैरल पहुँचा, तब भी आम लोगों को नहीं झेलनी पड़ी मार
(फोटो: IANS)

जब इस साल 28 फरवरी को होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हड़कंप मच गया, तो भारत ने उस दबाव में भी अपनी ईंधन आपूर्ति को लगभग सामान्य बनाए रखा। यूएई में भारत के पूर्व राजदूत नवदीप सूरी के मुताबिक, यह महज संयोग नहीं, बल्कि सक्रिय ऊर्जा कूटनीति और बहु-आयामी रणनीति का नतीजा था।

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IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को एजेंसी से बातचीत में सूरी ने कहा, "मुझे लगता है कि इस दौरान सरकार ने काफी सक्रिय ऊर्जा कूटनीति का प्रदर्शन किया।" उन्होंने स्पष्ट किया कि होर्मुज का बंद होना वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के लिए सबसे खराब स्थितियों में से एक था — फिर भी भारत इस झटके को प्रभावी ढंग से झेल गया।

खाड़ी देशों से मज़बूत रिश्ते आए काम

सूरी ने बताया कि यूएई, सऊदी अरब और कतर के साथ भारत के जो गहरे द्विपक्षीय संबंध हैं, वे इस संकट में असली ताकत बनकर उभरे। उन्होंने दो ठोस उदाहरण दिए — 15 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यात्रा और युद्ध के दौरान पेट्रोलियम मंत्री की कतर यात्रा। इन्हीं राजनयिक प्रयासों के चलते एलपीजी और कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित नहीं हुई।

नए आपूर्तिकर्ता देशों से बढ़ाए आयात के रास्ते

पूर्व राजदूत ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की कूटनीति केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रही। रूस, अमेरिका के अलावा वेनेजुएला, नाइजीरिया, गैबॉन और गुयाना जैसे अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के देशों से भी तेल आयात के स्रोत बढ़ाए गए। सूरी के शब्दों में, "इन सभी प्रयासों की वजह से, जब कई दूसरे देश गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रहे थे, तब भारत काफी हद तक इस संकट से बचने में सफल रहा।"

70 से 126 डॉलर प्रति बैरल की उछाल — बोझ उठाया सरकार ने

वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 126 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुँची। इतनी बड़ी बढ़ोतरी का असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े, इसके लिए सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया। सूरी ने बताया, "सरकार ने टैक्स में कटौती की और तेल कंपनियों ने अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा छोड़ा, जिससे आम लोगों पर कीमतों का बोझ नहीं पड़ा।" उनके अनुसार सरकार का मुख्य उद्देश्य था कि कम से कम शुरुआती दौर में आम उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाया जाए।

घरेलू उत्पादन बढ़ाया, माँग का प्रबंधन भी किया

सूरी ने बताया कि बाहरी आपूर्ति के साथ-साथ देश के भीतर भी कई कदम उठाए गए। कम समय में एलपीजी का घरेलू उत्पादन बढ़ाया गया और ईंधन की माँग को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया गया — इन दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करने से संकट को थामने में मदद मिली।

पाकिस्तान जैसे देशों से ज़मीन-आसमान का फ़र्क

तुलनात्मक नज़रिए से देखें तो पाकिस्तान जैसे देशों में स्कूल बंद करने पड़े और कई जगह ईंधन के लिए लंबी कतारें व भारी किल्लत देखी गई। इसके उलट, भारत में ईंधन की उपलब्धता लगभग सामान्य बनी रही। सूरी के अनुसार, यह अंतर कोई इत्तेफ़ाक नहीं — यह कूटनीतिक तैयारी, विविध आपूर्ति स्रोतों और घरेलू नीतिगत फ़ैसलों के समन्वय का परिणाम है।

इनपुट: IANS

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