गुरूवार, 10 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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ब्रिक्स का विस्तार: भारत के लिए कूटनीतिक अवसर और संतुलन की चुनौतियां

ब्रिक्स समूह का विस्तार भारत के लिए अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत करने और 'ग्लोबल साउथ' में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा अवसर लेकर आया है। स्वीडन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट पॉलिसी…

ब्रिक्स का विस्तार: भारत के लिए कूटनीतिक अवसर और संतुलन की चुनौतियां
(फोटो: IANS)

ब्रिक्स समूह का विस्तार भारत के लिए अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत करने और 'ग्लोबल साउथ' में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा अवसर लेकर आया है। स्वीडन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट पॉलिसी (ISDP) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विस्तार भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे सिद्धांतों को आगे बढ़ाने के लिए अधिक कूटनीतिक शक्ति प्रदान कर सकता है।

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समाचार एजेंसी IANS के हवाले से मिली इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत का लक्ष्य मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को बदलना नहीं, बल्कि उसके भीतर अपनी सौदेबाजी की क्षमता को बढ़ाना है। विस्तारित ब्रिक्स के माध्यम से भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की अपनी लंबे समय से चली आ रही मांग को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। रिपोर्ट का तर्क है कि ये वैश्विक संस्थाएं आज की आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं।

ग्लोबल साउथ के लिए भारत की आवाज़

यह विस्तारित मंच भारत को विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) की प्राथमिकताओं को प्रभावी ढंग से उठाने का एक व्यापक अवसर भी देता है। इनमें विकास के लिए वित्तपोषण, जलवायु न्याय, प्रौद्योगिकी तक पहुंच, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। ISDP का सुझाव है कि नई दिल्ली को ब्रिक्स के विस्तार को केवल चीन के प्रभाव के चश्मे से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे नए सदस्य देशों के साथ गठबंधन बनाने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए।

कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

हालांकि, रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि यह विस्तार भारत के लिए कई कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौतियां भी पेश करता है। भारत को चीन के साथ अपने संबंधों का प्रबंधन करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स चीन-केंद्रित मंच न बन जाए। इसी तरह, रूस के साथ अपनी पारंपरिक साझेदारी बनाए रखते हुए पश्चिम के साथ उसके टकराव का हिस्सा बनने से भी बचना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के हितों को समायोजित करते हुए भी भारत को ब्रिक्स को एक पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकना होगा।

भविष्य की राह

ISDP के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात जैसी व्यावहारिक मध्य शक्तियों के साथ संबंध मजबूत करना और नए सदस्यों को शामिल करते हुए समूह की प्रभावशीलता बनाए रखना भारत की प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक होगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि विस्तारित ब्रिक्स भारत को मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के उन देशों के साथ अधिक व्यवस्थित रूप से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है जो खुद को किसी पश्चिमी या चीनी खेमे का हिस्सा नहीं मानते, जो भारत की बहुध्रुवीय विदेश नीति के पूरी तरह से अनुरूप है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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