रविवार, 16 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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बच्चों की दुर्लभ दिमागी बीमारी 'वैनिशिंग व्हाइट मैटर' के इलाज की दिशा में नई उम्मीद

बच्चों में होने वाली एक दुर्लभ और जानलेवा दिमागी बीमारी 'वैनिशिंग व्हाइट मैटर' (VWM) के इलाज की दिशा में एक नई उम्मीद जगी है। नीदरलैंड के एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर्स के एक अध्ययन में पाया…

बच्चों की दुर्लभ दिमागी बीमारी 'वैनिशिंग व्हाइट मैटर' के इलाज की दिशा में नई उम्मीद
(फोटो: IANS)

बच्चों में होने वाली एक दुर्लभ और जानलेवा दिमागी बीमारी 'वैनिशिंग व्हाइट मैटर' (VWM) के इलाज की दिशा में एक नई उम्मीद जगी है। नीदरलैंड के एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर्स के एक अध्ययन में पाया गया है कि ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक मौजूदा दवा इस बीमारी की गति को धीमा कर सकती है। समाचार एजेंसी IANS की यह रिपोर्ट 'द लैंसेट न्यूरोलॉजी' में प्रकाशित अध्ययन पर आधारित है।

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वैनिशिंग व्हाइट मैटर एक आनुवंशिक बीमारी है जो मुख्य रूप से 1 से 6 साल की उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। इस बीमारी में धीरे-धीरे बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता और बौद्धिक कौशल खत्म होने लगता है, और स्थिति गंभीर होने पर यह जानलेवा साबित हो सकती है। फिलहाल VWM को रोकने या धीमा करने के लिए कोई भी स्वीकृत उपचार उपलब्ध नहीं है।

अध्ययन के महत्वपूर्ण निष्कर्ष

शोधकर्ताओं ने 'गुआनाबेंज' नाम की दवा के प्रभाव की जाँच की, जिसका उपयोग हाई ब्लड प्रेशर के लिए किया जाता है। अध्ययन के लिए VWM से पीड़ित बच्चों के एक समूह को यह दवा दी गई और तीन साल तक उनकी निगरानी की गई। फिर उनके परिणामों की तुलना अंतरराष्ट्रीय रजिस्ट्री में दर्ज 66 ऐसे बच्चों से की गई जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी।

नतीजे सकारात्मक रहे। गुआनाबेंज लेने वाले बच्चों में व्हीलचेयर पर निर्भर होने की स्थिति कम देखी गई। साथ ही, जिन बच्चों को व्हीलचेयर की ज़रूरत पड़ी, उनमें भी यह नौबत दवा न लेने वाले समूह की तुलना में काफी देर से आई। एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि अध्ययन की अवधि के दौरान दवा लेने वाले समूह में किसी भी बच्चे की मृत्यु नहीं हुई, जबकि दूसरे समूह के 66 बच्चों में से पांच की मौत हो गई।

दवा के साइड इफेक्ट्स और भविष्य की दिशा

हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि गुआनाबेंज इस बीमारी का पूर्ण इलाज नहीं है। इलाज के शुरुआती कुछ महीनों में दवा के कुछ साइड इफेक्ट्स भी देखे गए, जिनमें भ्रम (हैलुसिनेशन), ज़्यादा नींद आना, कब्ज और ब्लड प्रेशर का कम होना शामिल था। राहत की बात यह रही कि चार से छह महीने बाद ज़्यादातर बच्चों ने दवा को अच्छी तरह सहन करना शुरू कर दिया।

एम्स्टर्डम यूएमसी की रिटायर्ड प्रोफेसर मार्जो वैन डेर कनाप ने कहा, "चूंकि इस बीमारी से प्रभावित बच्चे बहुत छोटी उम्र के होते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि दवा के साइड इफेक्ट पहचाने जा सकें, उनका इलाज किया जा सके और वे अस्थायी हों।" संस्थान के अनुसार, अब एक फॉलो-अप स्टडी की जा रही है जिसमें बच्चों की लंबे समय तक निगरानी के साथ-साथ दवा की ज़्यादा खुराक के असर का भी आकलन किया जाएगा।

इनपुट: IANS

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