गोवा यौन उत्पीड़न मामला: निचली अदालत का फैसला पलट, तरुण तेजपाल को बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनाई 10 साल की सज़ा
2013 के एक चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में 'तहलका' के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई है। गुरुवार को दिए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने गोवा की निचली…
2013 के एक चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में 'तहलका' के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई है। गुरुवार को दिए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने गोवा की निचली अदालत के उस निर्णय को पलट दिया, जिसमें तेजपाल को बरी कर दिया गया था। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर की बेंच ने तेजपाल को अपनी एक पूर्व जूनियर सहयोगी के साथ बलात्कार और अन्य अपराधों का दोषी पाया।
कोर्ट ने तेजपाल को आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इससे पहले, जस्टिस गोखले की अध्यक्षता वाली बेंच ने गोवा सरकार की उस अपील को स्वीकार कर लिया था, जो मई 2021 में मापुसा की सेशंस कोर्ट के बरी करने वाले फैसले के खिलाफ दायर की गई थी।
किन धाराओं में हुई सज़ा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने तरुण तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(एफ) और 376(2)(के) (बलात्कार), 354ए (यौन उत्पीड़न) और 354बी के तहत दोषी ठहराया। सज़ा पर सुनवाई के दौरान तेजपाल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए आठ हफ्तों की रोक की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने उन्हें सिर्फ दो हफ्ते की मोहलत दी। तेजपाल ने भी नरमी की अपील करते हुए खुद को पीड़ित बताया और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का अनुरोध किया।
क्या था पूरा मामला
यह मामला नवंबर 2013 का है, जब गोवा के एक लक्ज़री होटल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान तेजपाल पर अपनी जूनियर सहयोगी के साथ लिफ्ट के अंदर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा था। गोवा पुलिस ने शिकायत के आधार पर बलात्कार समेत कई धाराओं में FIR दर्ज की थी। नवंबर 2013 में ही स्थानीय अदालत से अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज होने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, हालांकि जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नियमित ज़मानत दे दी थी।
निचली अदालत ने क्यों किया था बरी
मई 2021 में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी ने तेजपाल को यह कहते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे मामले को साबित करने में विफल रहा। जज ने जांच में कथित खामियों, जैसे सीसीटीवी फुटेज जैसे कुछ सबूतों को पेश न कर पाने का भी उल्लेख किया था। इसी फैसले को गोवा सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को समझने में गलती की और पीड़िता के व्यवहार पर अनुचित रूप से ध्यान केंद्रित किया। अभियोजन पक्ष ने तेजपाल द्वारा भेजे गए कथित माफीनामे वाले ईमेल जैसे अहम सबूतों को नजरअंदाज करने का भी आरोप लगाया था।
इनपुट: IANS



