भारतीय शेयर बाज़ार में घरेलू निवेशकों का दबदबा, विदेशी बिकवाली का असर हुआ खत्म
भारतीय शेयर बाज़ार में एक दिलचस्प तस्वीर उभर रही है, जहाँ घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की मज़बूत खरीदारी ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली के असर को पूरी तरह से बेअसर कर दिया है…
भारतीय शेयर बाज़ार में एक दिलचस्प तस्वीर उभर रही है, जहाँ घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की मज़बूत खरीदारी ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली के असर को पूरी तरह से बेअसर कर दिया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह के आँकड़े बताते हैं कि बाज़ार अब विदेशी संकेतों पर कम और घरेलू ताक़त पर ज़्यादा निर्भर हो रहा है।
बीते हफ़्ते विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार से 8,743.35 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की। आम तौर पर इतनी बड़ी बिकवाली से बाज़ार में गिरावट आनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह यह रही कि ठीक इसी दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 8,790.75 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश कर दिया, जो FII की बिकवाली से भी ज़्यादा था। इस घरेलू सहारे की बदौलत सप्ताह के अंत में निफ्टी 24,334.30 के स्तर पर बंद हुआ।
घरेलू पूंजी से मिल रही बाज़ार को मज़बूती
बाज़ार विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम भारतीय शेयर बाज़ार के लिए एक बड़ा सकारात्मक संकेत है। यह दिखाता है कि बाज़ार को सहारा देने में घरेलू निवेशकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विश्लेषकों के मुताबिक, देश में मज़बूत घरेलू तरलता (यानी निवेश के लिए उपलब्ध पैसा), स्थिर आर्थिक बुनियाद और कंपनियों की आय में सुधार की उम्मीदें मिलकर बाज़ार को ढाँचागत मज़बूती दे रही हैं।
अस्थिरता की आशंका अब भी बरक़रार
हालांकि, विश्लेषकों ने निवेशकों को आगाह भी किया है। एक विश्लेषक ने कहा, "भू-राजनीतिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मौद्रिक नीति से जुड़ी बदलती उम्मीदों के कारण निकट अवधि में बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।"
इसकी वजह यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव के चलते कच्चे तेल का भाव (ब्रेंट क्रूड) लगभग 88 डॉलर प्रति बैरल के ऊँचे स्तर पर बना हुआ है। इसके अलावा, मुद्रा बाज़ार के उतार-चढ़ाव और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता भी निवेशकों के सेंटिमेंट पर असर डाल सकती है।
आगे क्या? तिमाही नतीजों पर रहेगी नज़र
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में बाज़ार की दिशा तय करने में कंपनियों के तिमाही नतीजों की सबसे अहम भूमिका होगी। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजों के आधार पर ही अलग-अलग सेक्टरों में निवेश का रुझान तय होगा। इसलिए निवेशकों को सलाह दी गई है कि वे बाज़ार की रफ़्तार के पीछे भागने की जगह मज़बूत फंडामेंटल, बेहतर कमाई की क्षमता और लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाली कंपनियों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें।
इनपुट: IANS



