आबकारी नीति अवमानना मामला: केजरीवाल और सिसोदिया को मिलेंगे दस्तावेज, हाईकोर्ट ने 21 सितंबर तक बढ़ाई सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति मामले से जुड़ी एक अवमानना कार्यवाही में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत आम आदमी पार्टी (आप) के कई नेताओं को सुनवाई से पहले संबंधि…
दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति मामले से जुड़ी एक अवमानना कार्यवाही में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत आम आदमी पार्टी (आप) के कई नेताओं को सुनवाई से पहले संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 सितंबर की तारीख तय की है।
यह मामला न्यायपालिका की छवि खराब करने के कथित प्रयासों को लेकर शुरू की गई स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना कार्यवाही से जुड़ा है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा की खंडपीठ ने अपनी रजिस्ट्री को आदेश दिया कि अवमानना का आधार बनी सामग्री की डिजिटल प्रतियां सभी संबंधित पक्षों को मुहैया कराई जाएं। इससे पहले, केजरीवाल और अन्य नेताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने अदालत को बताया था कि उन्हें ये दस्तावेज नहीं मिले हैं।
जवाब दाखिल करने के लिए मिला चार सप्ताह का समय
अदालत ने प्रस्तावित अवमाननाकर्ताओं, जिनमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह, विनय मिश्रा और सौरभ भारद्वाज शामिल हैं, को अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का वक्त दिया है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि इन सभी नेताओं को नोटिस मिल चुका है और वे अदालत में पेश हो चुके हैं।
हालांकि, न्यायालय मित्र (एमिकस क्यूरी) राजदीपा बेहुरा ने पीठ को सूचित किया कि 'आप' नेता देवेश विश्वकर्मा को अभी तक नोटिस नहीं मिला है। इस पर खंडपीठ ने संबंधित एसएचओ के माध्यम से उन्हें नया नोटिस जारी करने का निर्देश दिया और कहा कि यदि वे दिए गए पते पर न मिलें तो उनका वर्तमान पता लगाकर नोटिस की तामील सुनिश्चित की जाए।
क्यों शुरू हुई थी यह कार्यवाही?
यह आपराधिक अवमानना कार्यवाही हाईकोर्ट की ही एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के एक आदेश के बाद शुरू हुई थी। उन्होंने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करने के बाद न्यायपालिका को निशाना बनाने वाले एक कथित सोशल मीडिया अभियान पर आपत्ति जताई थी। न्यायमूर्ति शर्मा ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह गतिविधियां अदालत की छवि खराब करने और न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से की गई थीं। बाद में उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया था, जिसके बाद यह सीबीआई की याचिका न्यायमूर्ति मनोज जैन को सौंपी गई।
इनपुट: IANS



