भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस और RAF के लिए बॉडी कैमरे: 6 महीने में SOP पर फैसला ले सरकार- दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए छह महीने का समय दिया है कि क्या विरोध प्रदर्शनों और भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी…
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए छह महीने का समय दिया है कि क्या विरोध प्रदर्शनों और भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी कैमरे अनिवार्य किए जाने चाहिए। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अदालत ने सरकार से इस संबंध में एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने पर विचार करने को कहा है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए यह निर्देश जारी किया। अदालत ने कहा कि वकील चाहत राघव द्वारा दायर इस याचिका को सरकार एक 'रिप्रेजेंटेशन' यानी औपचारिक अनुरोध के तौर पर ले और निर्धारित समय-सीमा के भीतर इस पर निर्णय ले।
क्या है पूरा मामला?
यह जनहित याचिका इस साल जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए कुछ विरोध प्रदर्शनों के बाद दायर की गई थी। इन प्रदर्शनों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक शामिल थे, और इस दौरान हुई झड़पों में 50 से अधिक पुलिस व अर्धसैनिक बलों के जवान और कुछ छात्र प्रदर्शनकारी घायल हो गए थे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने दलील दी कि मौजूदा व्यवस्था बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है, जो घेरे के बाहर से रिकॉर्डिंग करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इससे जवानों की गतिविधियों की ठीक से रिकॉर्डिंग नहीं हो पाती है। सिब्बल ने कहा, "अगर टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, तो जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करने में यह बहुत काम आ सकती है।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) से अलग है, जिसमें निगरानी संबंधी चिंताएं होती हैं।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिका को एक रिप्रेजेंटेशन के तौर पर माना जाएगा और छह महीने के भीतर इस पर फैसला ले लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शनों के आयोजन के लिए पहले से ही दिशा-निर्देश मौजूद हैं, जिनमें वीडियोग्राफी भी शामिल है। ASG शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जनहित याचिका दायर करने से पहले संबंधित अधिकारियों को एक रिप्रेजेंटेशन देना आवश्यक होता है।
सरकार के इस आश्वासन के बाद कि वह इस मामले पर विचार करेगी और छह महीने में अपना निर्णय बताएगी, हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
इनपुट: IANS



