ममता बनर्जी का सियासी भविष्य दांव पर: उपचुनाव से दूरी और पार्टी चिह्न पर संघर्ष
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी ने अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनाव में हिस्सा न लेने का फैसला किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह निर्णय उनके…
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी ने अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनाव में हिस्सा न लेने का फैसला किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह निर्णय उनके सहयोगियों के आग्रह के बावजूद लिया गया है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर एक बार फिर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। इस साल हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के साथ ही ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत हो गया था।
71 वर्षीय ममता बनर्जी कई मौकों पर भाजपा के खिलाफ विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन को मजबूत करने और अपने संगठन को फिर से खड़ा करने की इच्छा जाहिर कर चुकी हैं। उन्होंने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वियों, कम्युनिस्टों और कांग्रेस (जिससे वे 1998 में अलग हुई थीं) की ओर भी गठबंधन का हाथ बढ़ाया है।
चुनाव चिह्न और पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई
इस समय ममता बनर्जी का गुट पार्टी के मूल नाम और उसके 'दो फूलों' वाले चुनाव चिह्न को बचाने के लिए एक आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है। उनका मुकाबला रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट से है। पार्टी धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी और तस्करी जैसे गंभीर आरोपों से घिरी हुई है, जबकि सत्ता को लेकर गुटों में आपसी टकराव भी जारी है। कई बार सार्वजनिक रूप से पार्टी सदस्यों को डांटने और समितियों को भंग करने जैसे सख्त कदम उठाने के बावजूद, यह माना जा रहा है कि संगठन पर उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का नियंत्रण बढ़ रहा है।
उपचुनाव की अहमियत
पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। ये सीटें क्रमशः हुमायूं कबीर और मौजूदा मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं। हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी को रेजीनगर से चुनाव लड़ने का न्योता दिया था और जीत सुनिश्चित करने का दावा भी किया था। वहीं, दूसरे गुट का कहना था कि अगर ममता खुद चुनाव लड़ती हैं तो वे नंदीग्राम में उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। ये उपचुनाव ममता के गुट की जमीनी ताकत और उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होंगे।
राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका
कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 'इंडिया' गठबंधन पर ममता का जोर खुद को विपक्ष की एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है। उनके समर्थक 'इंडिया' (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस) नामकरण का श्रेय भी उन्हें ही देते हैं। हालांकि, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और एम.के. स्टालिन की डीएमके जैसी पार्टियां अब गठबंधन से दूर हो गई हैं, लेकिन कुछ नेताओं को उम्मीद है कि ममता के व्यक्तिगत संबंध उन्हें 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए वापस ला सकते हैं।
इनपुट: IANS



