शनिवार, 4 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
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चीन का नया 'जातीय एकता' कानून: अल्पसंख्यकों की पहचान पर 'चीनी राष्ट्र' को प्राथमिकता देने का दबाव

चीन में 1 जुलाई से एक नया कानून लागू हो गया है, जिसका उद्देश्य जातीय अल्पसंख्यकों पर एक एकीकृत 'चीनी पहचान' को प्राथमिकता देने के लिए दबाव बनाना है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 'जातीय

चीन का नया 'जातीय एकता' कानून: अल्पसंख्यकों की पहचान पर 'चीनी राष्ट्र' को प्राथमिकता देने का दबाव
(फोटो: IANS)

चीन में 1 जुलाई से एक नया कानून लागू हो गया है, जिसका उद्देश्य जातीय अल्पसंख्यकों पर एक एकीकृत 'चीनी पहचान' को प्राथमिकता देने के लिए दबाव बनाना है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला यह कानून' स्कूलों और माता-पिता को निर्देश देता है कि वे बच्चों में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के प्रति प्रेम की भावना पैदा करें।

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में यह कदम तिब्बती और उइगर जैसे अल्पसंख्यक समुदायों को एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान में ढालने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादारी सर्वोपरि हो। चीन में सरकार आधिकारिक तौर पर 56 जातीय समुदायों को मान्यता देती है, जिनमें हान चीनी समुदाय देश की 1.4 अरब आबादी का 90% से अधिक है।

कानून के प्रमुख प्रावधान

इस कानून के तहत ऐसा कोई भी काम प्रतिबंधित है जो 'जातीय एकता को कमजोर करे या अलग-अलग समुदायों के बीच विभाजन पैदा करे'। स्कूलों के पाठ्यक्रम को इस तरह से डिजाइन करने का निर्देश दिया गया है, जिससे छात्रों में यह भावना मजबूत हो कि वे सभी एक ही चीनी राष्ट्र का हिस्सा हैं।

मेलबर्न की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में चीन की जातीय नीतियों के विशेषज्ञ प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने सीएनएन से कहा, "सरकार अब एक ही चीनी राष्ट्रीय पहचान बनाने को स्कूलों, परिवारों, मीडिया, संग्रहालयों, सरकारी अधिकारियों, बजट, तकनीकी प्लेटफॉर्म और सुरक्षा एजेंसियों सभी की जिम्मेदारी बना रही है।" उन्होंने आगे कहा कि इसका स्पष्ट संदेश यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान तभी तक बनाए रख सकते हैं, जब तक वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा निर्धारित चीनी पहचान के अधीन हो।

अंतरराष्ट्रीय चिंता और प्रभाव

इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक पत्र में चेतावनी दी थी कि यह कानून तिब्बती, उइगर और मंगोल जैसे समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी आशंका जताई कि इस कानून का इस्तेमाल चीन की सीमाओं के बाहर रहने वाले लोगों को निशाना बनाने के लिए भी किया जा सकता है।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर पहले से ही विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों पर दबाव बनाने के आरोप लगते रहे हैं। मानवाधिकार संगठन 'सेफगार्ड डिफेंडर्स' की 2022 की एक रिपोर्ट में दुनिया भर में 100 से अधिक कथित चीनी 'विदेशी पुलिस स्टेशन' होने का दावा किया गया था, जिनका इस्तेमाल विदेशों में बसे चीनी नागरिकों की निगरानी और उन्हें परेशान करने के लिए किया जाता है।

इनपुट: IANS

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