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अहमदाबाद गरबा धोखाधड़ी: ChatGPT से बनाए नकली पास, इंस्टाग्राम पर बेचे, दो युवक गिरफ्तार

अहमदाबाद में नवरात्रि के गरबा आयोजनों का लुत्फ उठाने की चाहत रखने वाले सैकड़ों लोग एक sofisticated ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो गए। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शहर की साइबर क्राइम शाखा ने दो युवकों…

अहमदाबाद गरबा धोखाधड़ी: ChatGPT से बनाए नकली पास, इंस्टाग्राम पर बेचे, दो युवक गिरफ्तार
(फोटो: IANS)

अहमदाबाद में नवरात्रि के गरबा आयोजनों का लुत्फ उठाने की चाहत रखने वाले सैकड़ों लोग एक sofisticated ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो गए। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शहर की साइबर क्राइम शाखा ने दो युवकों को गिरफ्तार किया है, जिन पर करीब 686 फर्जी गरबा पास बेचकर लगभग 8 लाख रुपये की ठगी करने का आरोप है। आरोपी इतने विश्वसनीय दिखने वाले नकली पास बनाने के लिए चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे।

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गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपी राजस्थान के निवासी हैं। पुलिस ने तकनीकी जांच के बाद 21 वर्षीय वीरेंद्र सिंह राठौड़ और 22 वर्षीय किशन सिंह राठौड़ को पकड़ा। किशन को राजस्थान के सीकर जिले से गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि दोनों पहले भी इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े कामों का अनुभव रखते हैं।

कैसे दिया ठगी को अंजाम?

साइबर क्राइम की डीसीपी डॉ. लवीना सिन्हा ने बताया कि आरोपियों ने इंस्टाग्राम पर 'वीर राजपूत' नाम से एक प्रोफाइल बनाई थी। वे अहमदाबाद के बड़े गरबा आयोजकों की वेबसाइटों और सोशल मीडिया पेजों से तस्वीरें और जानकारी इकट्ठा करते थे। फिर चैटजीपीटी की मदद से बिल्कुल असली जैसे दिखने वाले पास तैयार करते थे, जिनमें बुकिंग आईडी, रेफरेंस नंबर और यहां तक कि क्यूआर कोड भी होते थे।

ग्राहकों तक पहुंचने के लिए उन्होंने मेटा की पेड विज्ञापन सुविधा का इस्तेमाल किया, जिससे उनके पोस्ट खासतौर पर अहमदाबाद के उन लोगों तक पहुंचे जो गरबा पास खरीदना चाहते थे। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, उनके इंस्टाग्राम पोस्ट को शहर में करीब 40,000 बार देखा गया था।

भारी छूट का लालच और भरोसे का खेल

आरोपियों ने टिकटों की कीमत बहुत कम रखी ताकि लोग आसानी से झांसे में आ जाएं। उदाहरण के तौर पर, जिस 'अनंत एक्सपीरियंस' गरबा इवेंट के पास की आधिकारिक कीमत 5,000 रुपये थी, उसे वे सिर्फ 1,500 रुपये में बेच रहे थे। इसी तरह 'मंडपम' के पास 500-600 रुपये में बेचे जा रहे थे।

ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए वे उनसे व्हाट्सएप पर भी संपर्क करते थे। पैसे मिलने के बाद वे फर्जी ईमेल आईडी से ग्राहकों को नकली पास भेज देते थे। इन पासों की असलियत का पता तब चलता था जब लोग गरबा स्थल पर पहुंचते थे और उनका क्यूआर कोड स्कैन नहीं होता था।

इनपुट: IANS

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News4Social गुजरात डेस्क

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