बांग्लादेश: यूनिवर्सिटी कैंपस में कट्टरपंथी जमात की पैठ, जिन्ना की तस्वीरों से खड़ा हुआ नया विवाद
बांग्लादेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी 'जमात-ए-इस्लामी' के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी अपने छात्र संगठन…
बांग्लादेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी 'जमात-ए-इस्लामी' के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी अपने छात्र संगठन 'इस्लामी छात्र शिबिर' के माध्यम से ढाका और चटगांव जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और पाकिस्तान-समर्थक एजेंडे को बढ़ावा दे रही है।
यह पूरा मामला ब्रिटिश अखबार 'एशियन लाइट' की एक रिपोर्ट के बाद सामने आया है। इस रिपोर्ट में ढाका यूनिवर्सिटी में हुए एक हालिया घटनाक्रम पर प्रकाश डाला गया है। वहां के छात्र संघ, जो अब 'इस्लामिक छात्र शिबिर' से जुड़ा बताया जाता है, ने विश्वविद्यालय के संग्रहालय में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरें और भाषण प्रदर्शित किए। इस प्रदर्शन ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है।
जिन्ना के भाषण पर क्यों है आपत्ति?
प्रदर्शित की गई सामग्री में जिन्ना का 1948 का वह विवादास्पद भाषण भी शामिल था, जो उन्होंने ढाका के रेस कोर्स मैदान में दिया था। इसमें उन्होंने घोषणा की थी कि पाकिस्तान की राजकीय भाषा 'सिर्फ और सिर्फ उर्दू' होगी, जिससे तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों की भाषाई अस्मिता को गहरी ठेस पहुंची थी। रिपोर्ट के अनुसार, जिन्ना ने तीन दिन बाद ढाका यूनिवर्सिटी में दिए एक भाषण में भी इसी बात को दोहराया था।
इस घटनाक्रम पर सत्ताधारी बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के छात्र संगठन 'जातीयतावादी छात्र दल' ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस प्रदर्शन को विश्वविद्यालय की छवि खराब करने वाली 'शर्मनाक हरकत' बताते हुए इसकी निंदा की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए ढाका विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह जांचने के लिए एक कमेटी का गठन किया है कि ये तस्वीरें संग्रहालय में कैसे प्रदर्शित की गईं।
संवैधानिक सुधारों पर भी टकराव
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जमात-ए-इस्लामी ने जुलाई 2024 के उस 'जुलाई विद्रोह' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके कारण शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार को सत्ता गंवानी पड़ी थी। बाद में, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान पार्टी ने अपने संगठनात्मक नेटवर्क को और मजबूत किया।
फिलहाल, सत्ताधारी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-दलीय विपक्षी गठबंधन के बीच टकराव का एक मुख्य मुद्दा संवैधानिक सुधार भी है। यूनुस सरकार के तहत तैयार किए गए इन प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य कथित तौर पर बांग्लादेश के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कमजोर करना और प्रधानमंत्री के मुकाबले राष्ट्रपति के अधिकारों को बढ़ाना है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है। बीएनपी सांसदों ने यह कहते हुए संवैधानिक सुधार परिषद में शामिल होने से इनकार कर दिया था कि संविधान में ऐसे किसी प्रावधान का उल्लेख नहीं है, जबकि जमात और उसके सहयोगियों ने संसदीय समिति में शामिल होने से मना कर दिया है।
इनपुट: IANS



