शिवसेना विवाद: 'चुनाव आयोग ने शक्तियों का उल्लंघन किया', सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलीलें
महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। उद्धव ठाकरे गुट का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग (ECI) के फैसले…
महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। उद्धव ठाकरे गुट का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग (ECI) के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए और दलील दी कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला सुनाया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, सिब्बल ने कहा कि ECI यह तय नहीं कर सकता कि किसी पार्टी का कौन सा संविधान वैध है।
सिब्बल ने अदालत को बताया कि 2018 के पार्टी संविधान के आधार पर दोनों गुट सत्ता पर दावा कर रहे थे, लेकिन चुनाव आयोग ने इसे नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ECI का काम अधिकतम किसी पार्टी की मान्यता रद्द करना हो सकता है, न कि पार्टी के आंतरिक संविधान की वैधता पर फैसला देना।
विधायकों की संख्या बनाम पार्टी संगठन
कपिल सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि उद्धव ठाकरे के समर्थन में पार्टी संगठन और कैडर के लाखों हलफनामे (affidavits) चुनाव आयोग को सौंपे गए थे। इसके बावजूद, आयोग ने केवल विधानसभा में विधायकों की संख्या को आधार बनाकर शिंदे गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न 'तीर-धनुष' आवंटित कर दिया। उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता था कि लेजिस्लेचर पार्टी में फूट और पार्टी में फूट एक ही चीज है।" सिब्बल के अनुसार, यह फैसला गलत और आयोग के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण था।
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि विधायकों की अयोग्यता और असली राजनीतिक पार्टी की पहचान, ये दोनों मामले जुड़े होने के बावजूद इनके कानूनी सवाल अलग-अलग हैं। उन्होंने सुभाष देसाई मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल विधायक दल छोड़ने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि विधायक ने राजनीतिक पार्टी भी छोड़ दी है। अदालत ने इस पर स्पष्टता मांगी कि स्पीकर किस आधार पर यह तय करेंगे कि विधायक ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है।
जवाब में सिब्बल ने कहा कि शिंदे गुट ने अलग प्रस्ताव पारित किया और उद्धव ठाकरे द्वारा नियुक्त व्हिप की जगह अपना नया व्हिप नियुक्त कर दिया, जो पार्टी छोड़ने का संकेत है। इस पर जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या अयोग्यता याचिका दायर होने के बाद की घटनाओं को इसका आधार बनाया जा सकता है।
अन्य प्रमुख दलीलें
सिब्बल ने कहा कि 21 जून 2022 को शिवसेना में कोई विभाजन नहीं हुआ था, केवल कुछ विधायक अलग हुए थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि विधायकों की अयोग्यता का फैसला नाम और सिंबल के आवंटन से पहले होना चाहिए था। उन्होंने कांग्रेस के विभाजन का उदाहरण देते हुए कहा कि तब दोनों धड़ों को अलग-अलग नाम दिए गए थे, लेकिन शिवसेना के मामले में ऐसा नहीं किया गया, जो अन्यायपूर्ण है।
इनपुट: IANS



