रविवार, 18 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
दुनिया

आर्कटिक में चीन की नई समुद्री राह, भारत के लिए क्या हैं इसके रणनीतिक मायने?

वैश्विक व्यापार के पारंपरिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच चीन ने एक नया रास्ता खोल दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग ने रूस के उत्तरी तट से होकर गुजरने वाले…

आर्कटिक में चीन की नई समुद्री राह, भारत के लिए क्या हैं इसके रणनीतिक मायने?
(फोटो: IANS)

वैश्विक व्यापार के पारंपरिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच चीन ने एक नया रास्ता खोल दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग ने रूस के उत्तरी तट से होकर गुजरने वाले नॉर्दर्न सी रूट (NSR) पर नियमित कंटेनर सेवा शुरू कर दी है। यह कदम चीन के ‘पोलर सिल्क रोड’ के सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसके भारत के लिए भी गहरे रणनीतिक और आर्थिक निहितार्थ हैं।

विज्ञापन

चीन की शिपिंग कंपनी सी लिजेंड ने निंगबो-झोउशान से ब्रिटेन के फेलिक्स्टोवे तक इस नए आर्कटिक मार्ग से लगभग 18 दिनों की यात्रा सेवा शुरू की है। यह पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग से लगने वाले 40 से अधिक दिनों के मुकाबले काफी कम है। लगभग 5,500 किलोमीटर लंबा यह मार्ग गर्मियों में बर्फ पिघलने के कारण अब पहले से ज्यादा समय तक जहाजों की आवाजाही के लिए खुला रहता है।

भारत के लिए चिंता और अवसर

चीन का यह कदम उसकी उन समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा है, जो होर्मुज या स्वेज जैसे संकटग्रस्त इलाकों से गुजरते हैं। यह भारत के लिए एक तरह की चुनौती है, क्योंकि यह समुद्री शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, भारत इस बदलाव से अनभिज्ञ नहीं है और उसने भी आर्कटिक में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। 17 मार्च 2022 को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा लॉन्च की गई भारत की आर्कटिक नीति अब सिर्फ वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग और खनिज संसाधन जैसे पहलू भी शामिल हो गए हैं।

रूस के साथ भारत की साझेदारी

दिलचस्प बात यह है कि भारत इस दौड़ में सिर्फ मूकदर्शक नहीं है। नई दिल्ली, रूस के साथ मिलकर चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर को भविष्य में नॉर्दर्न सी रूट से जोड़ने की संभावना तलाश रहा है। 2025 में नई दिल्ली में हुए भारत-रूस व्यापार मंच के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच NSR पर सहयोग बढ़ाने को लेकर सहमति बनी थी। दोनों देशों ने इस पर एक कार्यसमूह भी बनाया है, जो ध्रुवीय जल में चलने वाले जहाजों के विशेषज्ञों के प्रशिक्षण और आइसब्रेकर निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर काम कर रहा है।

आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

चीन की भौगोलिक स्थिति उसे आर्कटिक मार्ग का अधिक स्वाभाविक उपयोगकर्ता बनाती है। इसके विपरीत, भारत से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए NSR हमेशा पारंपरिक मार्गों से बेहतर विकल्प नहीं हो सकता। इसकी वजह ऊंची परिचालन लागत, विशेष जहाजों की कमी और सीमित नौवहन मौसम जैसी बाधाएं हैं। इसके अलावा, आर्कटिक का नाजुक पर्यावरण भी एक बड़ी चिंता है। किसी भी तेल रिसाव की स्थिति में अत्यधिक ठंड और दूरदराज के इलाके राहत कार्यों को बेहद मुश्किल बना सकते हैं। साथ ही, इस मार्ग का एक बड़ा हिस्सा रूस के नियंत्रण में है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाता है। चीन ने भले ही इस दिशा में पहला व्यावसायिक कदम उठा लिया हो, लेकिन भारत के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वह इस बदलते समुद्री नक्शे में पीछे न रह जाए।

इनपुट: IANS

N

News4Social इंटरनेशनल डेस्क

News4Social इंटरनेशनल डेस्क — IANS समेत लाइसेंस-प्राप्त समाचार एजेंसियों की फीड से अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से जुड़ी ताज़ा व प्रामाणिक खबरें संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित करता है। हर खबर उसके स्रोत के श्रेय (credit) के साथ दी जाती है। सभी लेख देखें →

आगे पढ़ें

और देखें →