शनिवार, 1 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
स्वास्थ्य

बच्चों की बातचीत का तरीका भविष्य में उनके मानसिक स्वास्थ्य का राज़ खोल सकता है: स्टैनफोर्ड स्टडी

बच्चे क्या बोलते हैं, इससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे अपनी बात कैसे कहते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि बच्चों के बात करने का तरीका, यानी उनके वाक्य बनाने…

बच्चों की बातचीत का तरीका भविष्य में उनके मानसिक स्वास्थ्य का राज़ खोल सकता है: स्टैनफोर्ड स्टडी
(फोटो: IANS)

बच्चे क्या बोलते हैं, इससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे अपनी बात कैसे कहते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि बच्चों के बात करने का तरीका, यानी उनके वाक्य बनाने का अंदाज़ और शब्दों को जोड़ने की शैली, भविष्य में डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याओं के जोखिम का संकेत दे सकती है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह अध्ययन उन तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है जिनसे हम बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य के खतरों की पहचान करते हैं।

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यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल 'नेचर मेंटल हेल्थ' में प्रकाशित हुआ है। इसमें शोधकर्ताओं ने 9 से 13 साल की उम्र के 200 से ज़्यादा बच्चों के साथ उनके जीवन के तनावपूर्ण अनुभवों पर करीब डेढ़ घंटे तक बातचीत की। इन इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग का विश्लेषण चार अलग-अलग नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) सिस्टम से किया गया। नतीजे हैरान करने वाले थे: सभी मॉडल्स ने काफी सटीकता से यह अनुमान लगा लिया कि अगले छह सालों में किन बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं विकसित होने की संभावना अधिक थी।

बातचीत का विश्लेषण क्यों है अहम?

अक्सर किशोरावस्था में ही डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याएं शुरू होती हैं, और एक बार विकसित हो जाने पर इनका इलाज मुश्किल हो सकता है। अब तक, बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य के जोखिम का पता लगाने के लिए डॉक्टरों की जांच, तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल के स्तर की जांच या अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों का सहारा लिया जाता रहा है। ये तरीके न सिर्फ महंगे और समय लेने वाले हैं, बल्कि इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना भी मुश्किल है। इसके विपरीत, बातचीत का विश्लेषण एक आसान, सस्ता और व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकता है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और स्टैनफोर्ड में न्यूरोसाइंस के डॉक्टरेट छात्र चेस एंटोनैकी ने कहा कि यह शोध इस बात का पुख्ता सबूत है कि भविष्य में ऐसे सरल उपकरण विकसित किए जा सकते हैं, जो बीमारी के उभरने से पहले ही जोखिम वाले बच्चों की पहचान कर लें।

क्या कहते हैं शोध के नतीजे?

विश्लेषण में पाया गया कि बच्चों ने अपनी बातचीत में "और", "लेकिन", "से", "तक" जैसे छोटे संयोजक शब्दों का इस्तेमाल कैसे किया, यह उनके भविष्य के मानसिक स्वास्थ्य का ज़्यादा सटीक संकेतक था, बजाय इसके कि उन्होंने किस विशेष घटना का जिक्र किया।

हालांकि, कुछ खास तरह के अनुभवों का भी असर दिखा। जिन बच्चों ने गंभीर शारीरिक हिंसा, मारपीट या सामाजिक अलगाव जैसी घटनाओं का जिक्र किया, उनमें भविष्य में मानसिक समस्याओं का खतरा अधिक पाया गया। वहीं, जिन बच्चों ने दोस्तों, परिवार के सहयोग, खेलकूद या अन्य सकारात्मक गतिविधियों की बात की, उनमें मानसिक रूप से मजबूत रहने की संभावना ज़्यादा थी। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर आगे के परीक्षणों में भी ऐसे ही परिणाम मिलते हैं, तो भविष्य में सिर्फ़ स्मार्टफोन पर रिकॉर्ड की गई बच्चों की सामान्य बातचीत का विश्लेषण करके ही उनके मानसिक स्वास्थ्य के जोखिम का पता लगाया जा सकेगा और समय पर मदद पहुंचाई जा सकेगी।

इनपुट: IANS

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News4Social हेल्थ डेस्क

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