आर्कटिक की बदलती जलवायु भारतीय मानसून के लिए बन सकती है चुनौती: कीर्ति वर्धन सिंह
भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन का सीधा असर भारत के मानसून, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है। इसी गंभीर संबंध को समझने के लिए भारत ने आर्कटिक…
भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन का सीधा असर भारत के मानसून, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है। इसी गंभीर संबंध को समझने के लिए भारत ने आर्कटिक, हिमालय और अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह बात विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने आइसलैंड के रेक्याविक में कही।
8 अक्टूबर को आर्कटिक सर्कल असेंबली 2026 में एक पैनल चर्चा के दौरान सिंह ने कहा, "जलवायु प्रणाली की सीमाएं भौगोलिक दूरी से तय नहीं होतीं। आर्कटिक भारत से काफी दूर है, लेकिन वहां होने वाले बदलावों का प्रभाव ध्रुवीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता।" विदेश मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी उनके संबोधन में उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि आर्कटिक के बदलाव यूरेशिया के वायुमंडलीय परिसंचरण को कैसे प्रभावित कर भारतीय मानसून से जुड़ते हैं।
भारत के लिए अनुसंधान का महत्व
कीर्ति वर्धन सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही इस जटिल संबंध से जुड़े सभी सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं, लेकिन भारत के लिए इस दिशा में लगातार शोध करना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय मानसून का सीधा वास्ता देश के कृषि उत्पादन, जल संसाधनों, ऊर्जा और करोड़ों नागरिकों की आजीविका से है। इसके लिए उन्होंने लंबे समय तक वैज्ञानिक निगरानी और विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि आर्कटिक की समुद्री बर्फ, हमेशा जमी रहने वाली जमीन (पर्माफ्रॉस्ट) और ग्लेशियरों में बदलाव का असर वैश्विक जलवायु प्रणाली पर पड़ता है। वहीं, हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने से वहां के पारिस्थितिकी तंत्र, नदियों में पानी की उपलब्धता और स्थानीय समुदायों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक यात्रा
भारत की आर्कटिक में वैज्ञानिक यात्रा 2007 में शुरू हुई थी। इसके बाद नॉर्वे में 2008 में 'हिमाद्रि' अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। भारत 2013 में आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक बना और 2014 में पानी के नीचे एक वेधशाला स्थापित की। पिछले साल दिसंबर 2023 से भारतीय वैज्ञानिकों ने सर्दियों में भी हिमाद्रि में अनुसंधान अभियान शुरू कर दिए हैं। भारत का शोध सिर्फ आर्कटिक तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय में 'हिमांशु' और अंटार्कटिका में 'मैत्री' तथा 'भारती' अनुसंधान केंद्र भी इस दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और भविष्य की दिशा
सिंह ने भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के बीच ध्रुवीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने संयुक्त अभियान, अनुसंधान सुविधाओं का साझा उपयोग और वैज्ञानिक आंकड़ों के आदान-प्रदान जैसे कई प्रस्ताव रखे। उन्होंने कहा कि 2032-33 में प्रस्तावित 'अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीय वर्ष' इस साझेदारी को मजबूत करने का एक बेहतरीन अवसर हो सकता है।
विदेश राज्य मंत्री ने आर्कटिक के मूल निवासियों और हिमालयी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को भी अहम बताया। उन्होंने कहा, "वैज्ञानिक अनुसंधान और पारंपरिक ज्ञान के बीच संवाद बढ़ाने से जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक खतरों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत एक पर्यवेक्षक के रूप में आर्कटिक में होने वाले किसी भी विकास का अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय कानून और पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखकर करेगा।
इनपुट: IANS



